Passage 43.10
श्रोत्रं होच्चक्राम । तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति । ते होचुः यथा बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति । प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
श्रोत्रम् ह उच्चक्राम । तत् संवत्सरम् प्रोष्य आगत्य, [यूयम्] मत् ऋते जीवितुम् कथम् अशकत इति उवाच । ते ह, यथा बधिराः श्रोत्रेण अशृण्वन्तः, प्राणेन प्राणन्तः, वाचा वदन्तः, चक्षुषा पश्यन्तः, मनसा विद्वांसः, रेतसा प्रजायमानाः [जीवन्ति], एवम् अजीविष्म इति ऊचुः । श्रोत्रम् ह प्रविवेश ।
हिन्दी अर्थ
श्रवण निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटने पर उसने पूछा, “मेरे बिना तुम कैसे जी सके?” उन्होंने कहा, “जैसे बहरे लोग: कान से न सुनते हुए, प्राण से साँस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, आँख से देखते हुए, मन से जानते हुए और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए हम ऐसे ही जीते रहे।” श्रवण फिर भीतर आ गया।
English meaning
Hearing departed. After staying away for a year, it returned and asked, “How were you able to live without me?” They answered, “Like deaf people: not hearing with the ear, but breathing with breath, speaking with speech, seeing with the eye, knowing with the mind and producing offspring through semen. That is how we lived.” Hearing entered again.
व्याख्या
वेदों को उपलब्ध कराने वाली शक्ति भी जीवन के मूल आधार के बराबर नहीं ठहरती। यह कथा की उपासना-संगति है, बहरे लोगों के प्रति सामाजिक उपेक्षा का समर्थन नहीं।
Explanation
Even the faculty that provides access to Vedic recitation is not identified with life’s basic support. This serves the story’s contemplative argument, not social exclusion of deaf people.
संदर्भ
तीसरा प्रस्थान सुनने की शक्ति का है। उत्तर में न सुनने और बाकी पाँच कार्यों को अलग-अलग रखा गया है।
Context
The third departure is hearing. The reply distinguishes not hearing from the five surviving activities.