Passage 43.14
सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति । यद्वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुः । यद्वा अहं संपदस्मि त्वं तत्संपदसीति श्रोत्रम् । यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनः । यद्वा अहं प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतः । तस्यो मे किमन्नं किं वास इति । यदिदं किञ्चा श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नम् । आपो वास इति । न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं प्रतिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद । तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्ति । एतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ॥ १४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सा ह वाक्, यत् वै अहम् वसिष्ठा अस्मि, त्वम् तत् वसिष्ठः असि इति उवाच । चक्षुः, यत् वै अहम् प्रतिष्ठा अस्मि, त्वम् तत् प्रतिष्ठः असि इति [उवाच] । श्रोत्रम्, यत् वै अहम् सम्पत् अस्मि, त्वम् तत् सम्पत् असि इति [उवाच] । मनः, यत् वै अहम् आयतनम् अस्मि, त्वम् तत् आयतनम् असि इति [उवाच] । रेतः, यत् वै अहम् प्रजातिः अस्मि, त्वम् तत् प्रजातिः असि इति [उवाच] । [प्राणः], तस्य उ मे किम् अन्नम्, किम् वासः [अस्ति] इति [पप्रच्छ] । [ते], यत् इदम् किञ्च आ श्वभ्यः, आ कृमिभ्यः, आ कीटपतङ्गेभ्यः [अन्नम् अस्ति], तत् ते अन्नम्; आपः वासः [सन्ति] इति [ऊचुः] । यः एवम् एतत् अनस्य अन्नम् वेद, अस्य जग्धम् अनन्नम् न ह वै भवति, प्रतिगृहीतम् अनन्नम् न [भवति] । तत् विद्वांसः श्रोत्रियाः अशिष्यन्तः आचामन्ति, अशित्वा आचामन्ति; तत् एतम् एव अनम् अनग्नम् कुर्वन्तः मन्यन्ते ।
हिन्दी अर्थ
वाणी ने कहा, “जो समृद्धि मुझमें है, उससे समृद्ध तुम ही हो।” आँख ने कहा, “जो प्रतिष्ठा मुझमें है, उससे प्रतिष्ठित तुम ही हो।” श्रवण ने कहा, “जो सम्पद् मैं हूँ, वह सम्पद् तुम ही हो।” मन ने कहा, “जो आश्रय मैं हूँ, वह आश्रय तुम ही हो।” वीर्य ने कहा, “जो प्रजनन मैं हूँ, वह प्रजनन तुम ही हो।” प्राण ने पूछा, “तो मेरा अन्न क्या है और मेरा वस्त्र क्या है?” उन्होंने कहा, “यहाँ जो कुछ भी अन्न है, कुत्तों से लेकर कृमियों और कीट-पतंगों तक का, वह सब तुम्हारा अन्न है; जल तुम्हारा वस्त्र है।” जो इस प्रकार अन, अर्थात् प्राण, के अन्न को जानता है, उसके द्वारा खाया हुआ कुछ भी अनन्न नहीं होता और स्वीकार किया हुआ कुछ भी अनन्न नहीं होता। यह जानते हुए वेदज्ञ लोग खाने से पहले जल का आचमन करते हैं और खाने के बाद भी आचमन करते हैं। वे मानते हैं कि इस प्रकार वे इसी अन, प्राण, को निर्वस्त्र नहीं रहने देते।
English meaning
Speech said, “The rich endowment that is mine is your rich endowment.” The eye said, “The support that is mine is your support.” Hearing said, “The attainment that I am is your attainment.” Mind said, “The dwelling-place that I am is your dwelling-place.” Semen said, “The generative power that I am is your generative power.” Breath asked, “What, then, is my food, and what is my clothing?” They answered, “Whatever food there is, extending to that of dogs, worms and crawling or flying insects, is your food; water is your clothing.” For one who knows in this way the food of ana, the breath, nothing eaten is non-food and nothing accepted is non-food. Knowing this, Vedic scholars sip water before eating and sip water after eating. They understand themselves thereby to be keeping this breath clothed.
व्याख्या
सभी जीवों के आहार को प्राण का अन्न मानना सार्वभौमिक जीवन-दृष्टि है। इसे कुछ भी खा लेने की स्वास्थ्य-सलाह नहीं बनाया जाना चाहिए। अन्त में अनम्, प्राण, को जलरूपी वस्त्र देने का भाव है। मूल प्रतिलिपि का अन्नम् प्रमाणित सुधार में अनम् किया गया है।
Explanation
Seeing the food of all creatures as breath’s food expresses a universal view of life, not advice to eat indiscriminately. The closing image clothes ana, breath, in water. The original transcription’s annam has been corrected to anam through documented primary-text comparison.
संदर्भ
इन्द्रियाँ अपने पाँच विशेष गुण प्राण को अर्पित करती हैं। कथा भोजन और जल-आचमन की व्याख्या पर समाप्त होती है।
Context
The faculties offer their five distinctive qualities to breath. The story ends by interpreting food and the sipping of water.