Passage 43.11
मनो होच्चक्राम । तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति । ते होचुः यथा मुग्धा अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति । प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
मनः ह उच्चक्राम । तत् संवत्सरम् प्रोष्य आगत्य, [यूयम्] मत् ऋते जीवितुम् कथम् अशकत इति उवाच । ते ह, यथा मुग्धाः मनसा अविद्वांसः, प्राणेन प्राणन्तः, वाचा वदन्तः, चक्षुषा पश्यन्तः, श्रोत्रेण शृण्वन्तः, रेतसा प्रजायमानाः [जीवन्ति], एवम् अजीविष्म इति ऊचुः । मनः ह प्रविवेश ।
हिन्दी अर्थ
मन निकल गया। एक वर्ष बाहर रहकर लौटने पर उसने पूछा, “मेरे बिना तुम कैसे जी सके?” उन्होंने कहा, “जैसे समझ न रखने वाले लोग: मन से न जानते हुए, प्राण से साँस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, आँख से देखते हुए, कान से सुनते हुए और वीर्य से सन्तान उत्पन्न करते हुए हम ऐसे ही जीते रहे।” मन फिर भीतर आ गया।
English meaning
Mind departed. After staying away for a year, it returned and asked, “How were you able to live without me?” They answered, “Like people without understanding: not knowing with the mind, but breathing with breath, speaking with speech, seeing with the eye, hearing with the ear and producing offspring through semen. That is how we lived.” Mind entered again.
व्याख्या
मुग्ध और अविद्वान् कथा के पुराने शब्द हैं, यहाँ समझ का अभाव बताने के लिए आए हैं। यह विचार-प्रयोग है, किसी वास्तविक मानसिक स्थिति का चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
Explanation
Mugdha and avidvan are the story’s old terms for lack of understanding. This is a thought experiment, not a medical description of an actual cognitive condition.
संदर्भ
चौथी परीक्षा में मन की जानने वाली क्रिया अलग की गई है। पहले “आश्रय” कहलाने वाला मन भी इस परीक्षा में निर्णायक नहीं बनता।
Context
The fourth trial isolates mind’s knowing activity. Mind, previously called the dwelling-place, is still not decisive in this test.