Passage 26.7
ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद । क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद । लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद । देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद । भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद । सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद । इदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
पदच्छेद
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मण-वर्ग उस व्यक्ति को दूर कर देता है जो वेदों को आत्मा से अलग जानता है। क्षत्र-वर्ग उसे दूर कर देता है जो क्षत्र को आत्मा से अलग जानता है। लोक उसे दूर कर देते हैं जो लोकों को आत्मा से अलग जानता है। देवता उसे दूर कर देते हैं जो देवताओं को आत्मा से अलग जानता है। वेद उसे दूर कर देते हैं जो वेदों को आत्मा से अलग जानता है। प्राणी उसे दूर कर देते हैं जो प्राणियों को आत्मा से अलग जानता है। सब कुछ उसे दूर कर देता है जो सबको आत्मा से अलग जानता है। यह ब्रह्मण-वर्ग, यह क्षत्र-वर्ग, ये लोक, ये देवता, ये वेद, ये प्राणी और यह सब, यही आत्मा है।
English meaning
The priestly order rejects one who knows the Vedas as apart from the Self. The ruling order rejects one who knows the ruling order as apart from the Self. Worlds reject one who knows worlds as apart from the Self. Gods reject one who knows gods as apart from the Self. Vedas reject one who knows Vedas as apart from the Self. Beings reject one who knows beings as apart from the Self. Everything rejects one who knows everything as apart from the Self. This priestly order, this ruling order, these worlds, these gods, these Vedas, these beings and all this are this Self.
व्याख्या
पहले वाक्य में स्रोत ब्रह्म के साथ वेदान् पढ़ता है, जबकि समानान्तर पाठ ब्रह्म पढ़ सकता है। अनुवाद ने इस असंगति को छिपाया नहीं। दूर कर देना रूपक है, सामाजिक बहिष्कार का आदेश नहीं।
Explanation
The first clause pairs brahma with vedan in this witness, where parallel texts may read brahma again. The translation does not conceal that mismatch. Rejection is a philosophical image, not an instruction to ostracize people.
संदर्भ
प्रियता की शिक्षा अब आत्मा से पृथक् जानने की आलोचना बनती है।
Context
The teaching about dearness becomes a critique of knowing things as separate from the Self.