Passage 26.5
स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधत् । हन्त तर्हि । भवत्येतद्व्याख्यास्यामि ते । व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
याज्ञवल्क्यः सः ह, नः प्रिया वै खलु सती भवती प्रियम् अवृधत् । हन्त तर्हि, भवति, एतत् ते व्याख्यास्यामि; व्याचक्षाणस्य तु मे [वचनम्] निदिध्यासस्व इति उवाच ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: आप तो हमें प्रिय थीं ही; अब आपने प्रियता और बढ़ा दी। अच्छा, मैं आपको यह समझाऊँगा। पर जब मैं समझाऊँ, तब आप गहराई से विचार करती रहें।
English meaning
Yajnavalkya said, “You were already dear to us, and have increased that dearness. Very well, I shall explain this to you. As I explain, reflect on it deeply.”
व्याख्या
निदिध्यासस्व यहाँ उपदेश के समय एकाग्र विचार का निर्देश है। मैत्रेयी निष्क्रिय श्रोता नहीं हैं; आगे वे कठिन कथन पर स्पष्ट आपत्ति भी रखेंगी।
Explanation
Nididhyasasva here requests sustained reflection during the explanation. Maitreyi is not passive; she will explicitly challenge a difficult statement.
संदर्भ
उत्तर सुनने के साथ सक्रिय मनन का आग्रह है।
Context
Listening is accompanied by a request for active reflection.