Passage 26.3
सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्स्यां न्वहं तेनामृताहो३ नेति । नेति होवाच याज्ञवल्क्यः । यथैवोपकरणवतां जीवितम् । तथैव ते जीवितं स्यात् । अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
मैत्रेयी सा ह, भगोः, यत् नु मे इयम् सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्, अहम् नु तेन अमृता स्याम्, अहो३ न [स्याम्] इति उवाच । याज्ञवल्क्यः ह, न इति उवाच । यथा एव उपकरणवताम् जीवितम् [अस्ति], तथा एव ते जीवितम् स्यात्; वित्तेन तु अमृतत्वस्य आशा न अस्ति इति ।
हिन्दी अर्थ
मैत्रेयी ने कहा: भगवन्, यदि यह सारी पृथ्वी धन से भरकर मेरी हो जाए, तो क्या मैं उससे अमृत हो जाऊँगी, या नहीं? याज्ञवल्क्य बोले: नहीं। जैसे साधन-सम्पन्न लोगों का जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन होगा। धन से अमृतत्व की आशा नहीं है।
English meaning
Maitreyi said, “Revered one, if this whole earth were mine, filled with wealth, would I thereby become immortal, or not?” Yajnavalkya answered, “No. Your life would be like that of people supplied with means. There is no hope of immortality through wealth.”
व्याख्या
धन जीवन के साधन दे सकता है, पर संवाद उसे अंतिम मुक्ति का पर्याप्त साधन नहीं मानता। आर्थिक सुरक्षा की उपयोगिता का निषेध नहीं किया गया।
Explanation
Wealth can furnish the means of living, but the dialogue denies that it is sufficient for final release. It does not deny the practical value of material security.
संदर्भ
मैत्रेयी धन के उपयोग को अमृतत्व की कसौटी पर पूछती हैं।
Context
Maitreyi tests the value of wealth against immortality.