Passage 20.4
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह उवाच—गार्गि, यत् दिवः ऊर्ध्वम् [अस्ति], यत् पृथिव्याः अवाक् [अस्ति], यत् इमे द्यावापृथिवी अन्तरा [अस्ति], यत् भूतम् च भवत् च भविष्यत् च इति आचक्षते, तत् आकाशे ओतम् च प्रोतम् च [अस्ति] इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: गार्गी, जो द्युलोक के ऊपर, पृथिवी के नीचे और इन दोनों के बीच है, तथा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह सब आकाश में ताने-बाने की तरह बुना है।
English meaning
Yajnavalkya replied, “Gargi, what is above heaven, below earth and between the two, and what is called past, present and future, is woven, warp and woof, in space.”
व्याख्या
आकाश यहाँ व्यापक आश्रय का दार्शनिक पद है। पर यह अंतिम उत्तर नहीं होगा, क्योंकि गार्गी आगे स्वयं आकाश का आश्रय पूछेंगी।
Explanation
Akasha functions as the encompassing support. It is not the final answer, since Gargi will next ask what supports space itself.
संदर्भ
पहले प्रश्न का उत्तर आकाश है।
Context
Space is the answer to the first question.