Passage 20.3
सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सा ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत् दिवः ऊर्ध्वम् [अस्ति], यत् पृथिव्याः अवाक् [अस्ति], यत् इमे द्यावापृथिवी अन्तरा [अस्ति], यत् भूतम् च भवत् च भविष्यत् च इति आचक्षते, तत् कस्मिन् ओतम् च प्रोतम् च [अस्ति] इति ।
हिन्दी अर्थ
गार्गी ने कहा: याज्ञवल्क्य, जो द्युलोक के ऊपर है, जो पृथिवी के नीचे है, जो इन द्यावा-पृथिवी के बीच है, और जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह सब किसमें ताने-बाने की तरह बुना है?
English meaning
Gargi asked, “Yajnavalkya, that which is above heaven, below earth and between this heaven and earth, and that which people call past, present and future: in what is all of it woven, warp and woof?”
व्याख्या
ऊपर, नीचे और बीच से स्थान का, तथा भूत-वर्तमान-भविष्य से समय का समावेश होता है। प्रश्न किसी एक देवता का स्थान नहीं, सम्पूर्ण अनुभव-जगत् का आश्रय पूछता है।
Explanation
Above, below and between encompass spatial extent; past, present and future encompass time. The question asks for the support of the whole experienced world, not merely one deity’s location.
संदर्भ
पहला बाण समस्त स्थान और काल के आधार का प्रश्न है।
Context
The first arrow asks for the basis of all space and time.