Passage 20.6
सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सा ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत् दिवः ऊर्ध्वम् [अस्ति], यत् पृथिव्याः अवाक् [अस्ति], यत् इमे द्यावापृथिवी अन्तरा [अस्ति], यत् भूतम् च भवत् च भविष्यत् च इति आचक्षते, तत् कस्मिन् ओतम् च प्रोतम् च [अस्ति] इति ।
हिन्दी अर्थ
गार्गी ने फिर पूछा: याज्ञवल्क्य, जो द्युलोक के ऊपर, पृथिवी के नीचे और इन दोनों के बीच है, तथा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह किसमें ताने-बाने की तरह बुना है?
English meaning
Gargi asked again, “Yajnavalkya, what is above heaven, below earth and between the two, and what is called past, present and future: in what is it woven, warp and woof?”
व्याख्या
यह पुनरुक्ति स्रोत का हिस्सा है, अनावश्यक सम्पादकीय दोहराव नहीं। स्थापित उत्तर को फिर सामने रखकर उसका भी आधार पूछा जाने वाला है।
Explanation
The repetition belongs to the source. It reinstates the accepted answer so that its own foundation can be questioned.
संदर्भ
दूसरे प्रश्न की भूमिका में पहले प्रश्न को फिर दुहराया जाता है।
Context
The earlier question is repeated as the premise of the second.