Passage 20.11
तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ । नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ । नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ । नान्यदतोऽस्ति मन्तृ । नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ । एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
गार्गि, तत् वा एतत् अक्षरम् अदृष्टम् द्रष्टृ [अस्ति], अश्रुतम् श्रोतृ [अस्ति], अमतम् मन्तृ [अस्ति], अविज्ञातम् विज्ञातृ [अस्ति] । अतः अन्यत् द्रष्टृ न अस्ति; अतः अन्यत् श्रोतृ न अस्ति; अतः अन्यत् मन्तृ न अस्ति; अतः अन्यत् विज्ञातृ न अस्ति । गार्गि, नु खलु एतस्मिन् अक्षरे आकाशः ओतः च प्रोतः च [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
गार्गी, वह अक्षर स्वयं अदृष्ट है, पर देखने वाला; अश्रुत है, पर सुनने वाला; विचार का विषय नहीं, पर विचार करने वाला; ज्ञात विषय नहीं, पर जानने वाला है। उससे अलग कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता या ज्ञाता नहीं है। गार्गी, इसी अक्षर में आकाश ताने-बाने की तरह बुना है।
English meaning
Gargi, this imperishable is unseen yet seeing, unheard yet hearing, unthought yet thinking, unknown as an object yet knowing. There is no seer, hearer, thinker or knower apart from it. In this imperishable, Gargi, space is woven, warp and woof.
व्याख्या
पहले नकारे गए आँख-कान का अभाव अचेतनता नहीं बताया गया। देखने-सुनने के विषय से परे ज्ञाता का स्वरूप इस अनुच्छेद को अन्तर्यामी के निष्कर्ष से जोड़ता है।
Explanation
The earlier denial of eyes and ears is not a denial of awareness. The knower beyond visible and audible objects connects this passage with the inner-ruler conclusion.
संदर्भ
दूसरे प्रश्न का उत्तर अब ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से पूरा होता है।
Context
The second answer is completed through the distinction between knower and known.