Passage 20.2
सा होवाच अहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थाम् । तौ मे ब्रूहीति । पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सा ह उवाच—याज्ञवल्क्य, वै अहम् त्वा, यथा काश्यः वा वैदेहः वा उग्रपुत्रः उज्ज्यम् धनुः अधिज्यम् कृत्वा, बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ द्वौ [शरौ] हस्ते कृत्वा उपोत्तिष्ठेत्, एवम् एव अहम् त्वा द्वाभ्याम् प्रश्नाभ्याम् उपोदस्थाम् । तौ मे ब्रूहि इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] गार्गि, पृच्छ इति ।
हिन्दी अर्थ
गार्गी ने कहा: याज्ञवल्क्य, जैसे काशी या विदेह का कोई वीर पुत्र बिना प्रत्यञ्चा वाले धनुष पर डोरी चढ़ाकर, शत्रु को भेदने वाले दो बाण हाथ में लेकर सामने आ खड़ा हो, वैसे ही मैं दो प्रश्नों के साथ तुम्हारे सामने खड़ी हूँ। उनके उत्तर दो। उन्होंने कहा: पूछो, गार्गी।
English meaning
Gargi said, “Yajnavalkya, as a warrior son of Kashi or Videha might string an unstrung bow and stand confronting an opponent with two piercing arrows in his hand, so I confront you with two questions. Answer them for me.” He replied, “Ask, Gargi.”
व्याख्या
धनुष और बाण बौद्धिक तीक्ष्णता के रूपक हैं। पाठ यहाँ वास्तविक युद्ध की योजना नहीं देता, बल्कि गार्गी के आत्मविश्वास को नाटकीय रूप देता है।
Explanation
Bow and arrows dramatize intellectual precision and Gargi’s confidence; the passage is not a plan for physical combat.
संदर्भ
दो प्रश्नों की तैयारी को धनुर्धर की चुनौती से व्यक्त किया जाता है।
Context
The two questions are introduced through an archer’s challenge.