Passage 20.7
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति । कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह उवाच—गार्गि, यत् दिवः ऊर्ध्वम् [अस्ति], यत् पृथिव्याः अवाक् [अस्ति], यत् इमे द्यावापृथिवी अन्तरा [अस्ति], यत् भूतम् च भवत् च भविष्यत् च इति आचक्षते, तत् आकाशे एव ओतम् च प्रोतम् च [अस्ति] इति । [गार्गी पप्रच्छ—] आकाशः कस्मिन् नु खलु ओतः च प्रोतः च [अस्ति] इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: गार्गी, जो द्युलोक के ऊपर, पृथिवी के नीचे और दोनों के बीच है, तथा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह आकाश में ही ताने-बाने की तरह बुना है। गार्गी ने पूछा: तब आकाश स्वयं किसमें बुना है?
English meaning
Yajnavalkya replied, “Gargi, what is above heaven, below earth and between the two, and what is called past, present and future, is woven in space itself.” Gargi asked, “In what, then, is space woven?”
व्याख्या
आकाश को सबका आधार कहने पर भी प्रश्न रुकता नहीं। गार्गी किसी विशाल वस्तु को अंतिम मान लेने के बजाय आधार की खोज को उसके पार ले जाती हैं।
Explanation
Calling space the support of everything does not stop the inquiry. Gargi refuses simply to identify the largest conceivable object as the ultimate foundation.
संदर्भ
यहीं दूसरा, अधिक मूलभूत प्रश्न स्पष्ट रूप से सामने आता है।
Context
The second, more fundamental question now becomes explicit.