Passage 14.13
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीति । आहर सौम्य हस्तम् आर्तभाग । आवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत्सजन इति । तौ होत्क्रम्य मन्त्रयां चक्राते । तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुः । अथ ह यत्प्रशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः । पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति । ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[आर्तभागः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत्र अस्य मृतस्य पुरुषस्य वाक् अग्निम् अप्येति, प्राणः वातम् [अप्येति], चक्षुः आदित्यम् [अप्येति], मनः चन्द्रम् [अप्येति], श्रोत्रम् दिशः [अप्येति], शरीरम् पृथिवीम् [अप्येति], आत्मा आकाशम् [अप्येति], लोमानि ओषधीः [अपियन्ति], केशाः वनस्पतीन् [अपियन्ति], लोहितम् च रेतः च अप्सु निधीयते, तदा अयम् पुरुषः क्व भवति इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] सौम्य आर्तभाग, हस्तम् आहर । आवाम् एव एतस्य वेदिष्यावः; नौ एतत् सजने न [निर्णेतुम् शक्यम्] इति । तौ ह उत्क्रम्य मन्त्रयाम् चक्राते । तौ ह यत् ऊचतुः, तत् कर्म ह एव ऊचतुः । अथ ह यत् प्रशंसतुः, तत् कर्म ह एव प्रशशंसतुः । वै [पुरुषः] पुण्येन कर्मणा पुण्यः भवति, पापेन [कर्मणा] पापः [भवति] इति । ततः ह जारत्कारवः आर्तभागः उपरराम ।
हिन्दी अर्थ
आर्तभाग ने कहा: याज्ञवल्क्य, जब इस मृत पुरुष की वाणी अग्नि में, प्राण वायु में, आँख सूर्य में, मन चन्द्रमा में, कान दिशाओं में, शरीर पृथिवी में, आत्मरूप आकाशीय अंश आकाश में, रोम औषधियों में, केश वनस्पतियों में, और रक्त तथा वीर्य जल में चले जाते हैं, तब यह पुरुष कहाँ रहता है? याज्ञवल्क्य ने कहा: सौम्य आर्तभाग, अपना हाथ लाओ; हम दोनों ही इसे जानेंगे, भीड़ के बीच नहीं। वे अलग जाकर विचार करने लगे। उन्होंने जो कहा, वह कर्म ही था; उन्होंने जिसकी प्रशंसा की, वह कर्म ही था। मनुष्य पुण्य कर्म से पुण्य और पाप कर्म से पाप होता है। तब जरत्कारु के वंशज आर्तभाग चुप हो गए।
English meaning
Artabhaga said, “Yajnavalkya, when a dead person’s speech merges into fire, breath into wind, sight into the sun, mind into the moon, hearing into the directions, body into earth, the bodily space into space, body-hair into herbs, head-hair into trees, and blood and semen are placed in the waters, where is that person then?” Yajnavalkya said, “Give me your hand, dear Artabhaga. We two shall settle this, not here in the crowd.” They withdrew and deliberated. What they spoke of was action; what they commended was action. One becomes good through good action and bad through bad action. Artabhaga of the Jaratkaru lineage then fell silent.
व्याख्या
गुप्त संवाद का पूरा विवरण नहीं दिया गया; कथावाचक उसका निष्कर्ष कर्म के रूप में बताता है। आत्मा शब्द का यहाँ देहगत आकाश से सम्बन्ध है; उसे बिना भेद किए परम आत्मा का नाश न समझें।
Explanation
The private discussion is not fully reported; the narrator gives its conclusion in terms of action. Atman in the dissolution list is contextually associated with bodily space, not a straightforward declaration that the ultimate Self is destroyed.
संदर्भ
देह और इन्द्रियों के ब्रह्माण्डीय लय के बाद नैतिक निरन्तरता का प्रश्न उठता है।
Context
After the cosmic dissolution of bodily faculties, the question concerns moral continuity.