Passage 14.10
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित्सा देवता यस्या मृत्युरन्नमिति । अग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नम् । अप पुनर्मृत्युं जयति ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
[आर्तभागः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत् इदम् सर्वम् मृत्योः अन्नम् [अस्ति], [तत्र] सा का स्वित् देवता [अस्ति] यस्याः मृत्युः अन्नम् [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] वै अग्निः मृत्युः [अस्ति]; सः अपाम् अन्नम् [अस्ति] । [विद्वान्] पुनर्मृत्युम् अप जयति ।
हिन्दी अर्थ
आर्तभाग ने कहा: याज्ञवल्क्य, जब यह सब मृत्यु का अन्न है, तो वह कौन-सी देवता है जिसका अन्न मृत्यु है? उत्तर था: अग्नि ही मृत्यु है, और वह जल का अन्न है। इस प्रकार पुनर्मृत्यु पर विजय पाई जाती है।
English meaning
Artabhaga said, “Yajnavalkya, if all this is death’s food, what deity has death itself as food?” “Fire is death, and fire is the food of water. One thereby overcomes repeated death.”
व्याख्या
अग्नि के सबको भस्म करने और जल के अग्नि बुझाने की छवि से मृत्यु की भी सीमा दिखाई जाती है। पुनर्मृत्यु का अतिक्रमण धार्मिक दावा है, जल द्वारा मृत्यु रोकने का चिकित्सकीय निर्देश नहीं।
Explanation
Fire consumes, yet water extinguishes fire: the image gives death a limit. Overcoming repeated death is a religious claim, not a medical claim about water.
संदर्भ
प्रश्न अब उस शक्ति पर है जो स्वयं मृत्यु को निगल सके।
Context
The question now asks what can consume death itself.