Passage 14.11
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात्प्राणाः क्रामन्त्याहो नेति । नेति होवाच याज्ञवल्क्यः । अत्रैव समवनीयन्ते । स उच्छ्वयति । आध्मायति । आध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[आर्तभागः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत्र अयम् पुरुषः म्रियते, अस्मात् प्राणाः उत् क्रामन्ति आहो न इति । याज्ञवल्क्यः ह उवाच—न इति । [प्राणाः] अत्र एव समवनीयन्ते । सः उच्छ्वयति, आध्मायति; आध्मातः मृतः शेते ।
हिन्दी अर्थ
आर्तभाग ने कहा: याज्ञवल्क्य, जब यह पुरुष मरता है, तो क्या उसके प्राण उससे ऊपर निकल जाते हैं या नहीं? याज्ञवल्क्य ने कहा: नहीं, वे यहीं एकत्र हो जाते हैं। वह फूलता है, वायु से भरता है और फूला हुआ मृत पड़ा रहता है।
English meaning
Artabhaga said, “Yajnavalkya, when this person dies, do the vital powers rise out of him, or not?” Yajnavalkya answered, “No. They converge here itself. He swells, becomes inflated, and lies dead and swollen.”
व्याख्या
उत्तर का नहीं अन्य प्रसंगों में प्राणों की गति पर होने वाली चर्चा को मिटाता नहीं है। यह संवाद के इस प्रश्न का कथन है; शरीर के फूलने का उल्लेख प्राचीन देह-दृष्टि है, आधुनिक मृत्यु-विज्ञान नहीं।
Explanation
The answer “no” should not erase accounts of departing vital powers elsewhere in the work. It answers this question in its own context; the bodily description is historical, not a modern physiological explanation.
संदर्भ
आर्तभाग मृत्यु के समय प्राणों की गति पर सीधा प्रश्न करते हैं।
Context
Artabhaga directly asks about the vital powers at death.