Passage 10.14
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति । यत्र वास्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् । येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् । विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
हि यत्र द्वैतम् इव भवति, तत् इतरः इतरम् जिघ्रति, तत् इतरः इतरम् पश्यति, तत् इतरः इतरम् शृणोति, तत् इतरः इतरम् अभिवदति, तत् इतरः इतरम् मनुते, तत् इतरः इतरम् विजानाति । यत्र वा अस्य सर्वम् आत्मा एव अभूत्, तत् केन कम् जिघ्रेत्? तत् केन कम् पश्येत्? तत् केन कम् शृणुयात्? तत् केन कम् अभिवदेत्? तत् केन कम् मन्वीत? तत् केन कम् विजानीयात्? येन इदम् सर्वम् विजानाति, तम् केन विजानीयात्? अरे, विज्ञातारम् केन विजानीयात् इति ।
हिन्दी अर्थ
जहाँ मानो द्वैत है, वहाँ एक दूसरे को सूँघता है, एक दूसरे को देखता है, एक दूसरे को सुनता है, एक दूसरे से बोलता है, एक दूसरे को मन में सोचता है और एक दूसरे को जानता है। पर जहाँ उसके लिए सब आत्मा ही हो गया, वहाँ किस साधन से किसे सूँघे, किस साधन से किसे देखे, किस साधन से किसे सुने, किस साधन से किससे बोले, किस साधन से किसे सोचे और किस साधन से किसे जाने? जिसके द्वारा यह सब जाना जाता है, उसे किसके द्वारा जाना जाए? प्रिय, जानने वाले को किसके द्वारा जाना जाए?
English meaning
Where there is duality, as it were, one smells another, sees another, hears another, speaks to another, thinks of another and knows another. But where everything has become the Self for that person, by what could one smell whom, by what could one see whom, by what could one hear whom, by what could one speak to whom, by what could one think of whom, and by what could one know whom? By what could one know that through which all this is known? By what, my dear, could one know the knower?
व्याख्या
द्वैतमिव का मानो महत्त्वपूर्ण है। सामान्य अनुभूति में दूसरा ज्ञेय होता है; सब आत्मा होने पर अलग ज्ञाता को उसी ढाँचे में वस्तु बनाकर नहीं जाना जा सकता। स्रोत में दोहराई गई सूँघने की दोनों अतिरिक्त क्रियाएँ प्रमाणित सुधार में हटाई गई हैं; बचा हुआ क्रम नहीं बदला गया।
Explanation
The “as it were” in duality matters. Ordinary cognition takes another as its object; when all is the Self, the knower cannot be turned into a separate object in that same framework. The two accidentally duplicated smelling clauses were removed by a documented repair; the remaining selected order is unchanged.
संदर्भ
मैत्रेयी के प्रश्न का उत्तर ज्ञाता, जानने के साधन और ज्ञेय की त्रिपुटी के द्वारा दिया जाता है।
Context
The reply to Maitreyi examines the relation among knower, means of knowing and object known.