Passage 13.9
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीति । एकयेति । कतमा सैकेति । मन एवेति । अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवाः । अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[अश्वलः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, अयम् ब्रह्मा अद्य दक्षिणतः कतिभिः देवताभिः यज्ञम् गोपायति इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] एकया [देवतया गोपायति] इति । [अश्वलः पप्रच्छ—] सा एका कतमा [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] मनः एव [सा देवता अस्ति] इति । वै मनः अनन्तम् [अस्ति]; विश्वे देवाः अनन्ताः [सन्ति] । सः तेन अनन्तम् एव लोकम् जयति ।
हिन्दी अर्थ
अश्वल ने कहा: याज्ञवल्क्य, आज ब्रह्मा पुरोहित दक्षिण दिशा से कितनी देवताओं के द्वारा यज्ञ की रक्षा करता है? एक से। वह एक कौन है? मन ही। मन अनन्त है और विश्वेदेव अनन्त हैं। उसके द्वारा वह अनन्त लोक जीतता है।
English meaning
Ashvala said, “Yajnavalkya, with how many deities does the brahman priest guard the sacrifice from the south today?” “With one.” “Which one?” “Mind alone. Mind is endless, and the All-gods are endless. Through it he wins an endless world.”
व्याख्या
मन की विविध वृत्तियों और देवताओं की बहुलता के बीच अनन्तता का सम्बन्ध बनाया गया है। दक्षिणतः यहाँ पुरोहित की अनुष्ठानिक स्थिति को बताता है।
Explanation
The connection is the boundlessness attributed to mental activity and to the All-gods. “From the south” identifies the priest’s ritual position.
संदर्भ
ब्रह्मा पुरोहित के मौन निरीक्षण का आन्तरिक आधार पूछा जाता है।
Context
The inner basis of the supervising priest’s guardianship is examined.