Passage 13.7
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन् यज्ञे करिष्यतीति । तिसृभिरिति । कतमास्तास्तिस्र इति । पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया । किं ताभिर्जयतीति । यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[अश्वलः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, अयम् होता अद्य अस्मिन् यज्ञे कतिभिः ऋग्भिः करिष्यति इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] तिसृभिः [ऋग्भिः करिष्यति] इति । [अश्वलः पप्रच्छ—] ताः तिस्रः कतमाः [सन्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्या एव तृतीया [सन्ति] । [अश्वलः पप्रच्छ—] ताभिः किम् जयति इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] यत् इदम् किम् च प्राणभृत् [अस्ति, तत् जयति] इति ।
हिन्दी अर्थ
अश्वल ने कहा: याज्ञवल्क्य, आज इस यज्ञ में होता कितनी प्रकार की ऋचाओं से कार्य करेगा? उत्तर था: तीन से। वे तीन कौन-सी हैं? पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या। उनसे वह क्या जीतता है? यह जो कुछ भी प्राण धारण करता है, वह सब।
English meaning
Ashvala said, “Yajnavalkya, with how many kinds of verses will the hotri act in this sacrifice today?” “Three.” “Which three?” “The preliminary invitatory verse, the offering verse, and the recited praise as the third.” “What does he win through them?” “Whatever here bears life.”
व्याख्या
तीन का अर्थ पूरे यज्ञ में केवल तीन पंक्तियाँ पढ़ना नहीं है; ये ऋचाओं के प्रयोजन के अनुसार तीन वर्ग हैं। फल का कथन यज्ञ की ऐतिहासिक विश्वदृष्टि के भीतर है।
Explanation
The three are functional classes of verses, not necessarily only three individual lines in the entire rite. The promised result belongs to the text’s historical ritual worldview.
संदर्भ
अब प्रश्न अनुष्ठानिक त्रयों और उनके फलों पर आते हैं।
Context
The questions now concern ritual triads and their results.