Passage 13.6
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्बणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति । ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण । मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा । तद्यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा । अथ संपदः ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[अश्वलः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत् इदम् अन्तरिक्षम् अनारम्बणम् इव [अस्ति], केन आक्रमेण यजमानः स्वर्गम् लोकम् आक्रमते इति । [याज्ञवल्क्यः आह—यजमानः] ब्रह्मणा ऋत्विजा मनसा चन्द्रेण [आक्रमते] । वै मनः यज्ञस्य ब्रह्मा [अस्ति] । तत् यत् इदम् मनः [अस्ति], सः असौ चन्द्रः [अस्ति]; सः ब्रह्मा [अस्ति]; सः मुक्तिः [अस्ति]; सा अतिमुक्तिः [अस्ति] इति । [इमे] अतिमोक्षाः [उक्ताः] । अथ संपदः [उच्यन्ते] ।
हिन्दी अर्थ
अश्वल ने कहा: याज्ञवल्क्य, जब यह अन्तरिक्ष मानो आधारहीन है, तो यजमान किस साधन से चढ़कर स्वर्गलोक पहुँचता है? उत्तर था: ब्रह्मा ऋत्विज्, मन और चन्द्रमा के द्वारा। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। जो यह मन है, वही वह चन्द्रमा है, वही ब्रह्मा है। यही मुक्ति है, यही परे की मुक्ति है। ये अतिमोक्ष के सम्बन्ध थे; अब सम्पद् अर्थात् ध्यानात्मक समीकृतियाँ कही जाती हैं।
English meaning
Ashvala said, “Yajnavalkya, since this intermediate space seems to offer no support, by what means of ascent does the sacrificer reach the heavenly world?” “Through the officiating brahman priest, through mind, through the moon. Mind is the sacrifice’s brahman priest. This mind is that moon; it is the brahman priest. This is release, this is release beyond.” These are the ways of transcending; now follow the contemplative correspondences.
व्याख्या
यहाँ ब्रह्मा सृष्टिकर्ता देवता नहीं, यज्ञ का निरीक्षक पुरोहित है। सम्पद् का अर्थ इस प्रसंग में धन नहीं, अनुष्ठानिक वस्तुओं को व्यापक परिणामों से चिन्तन द्वारा जोड़ना है।
Explanation
Brahman here names the supervising priest, not the creator deity. Sampad in this context is contemplative correlation, rather than material wealth.
संदर्भ
चार मुख्य ऋत्विजों की ध्यानात्मक संगति यहाँ पूरी होती है।
Context
The correspondences of the four principal priests conclude here.