Passage 13.3
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वं मृत्युनाप्तं सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति । होत्रर्त्विजाग्निना वाचा । वाग्वै यज्ञस्य होता । तद्येयं वाक्सोऽयमग्निः स होता सा मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[अश्वलः] ह उवाच—याज्ञवल्क्य, यत् इदम् सर्वम् मृत्युना आप्तम् [अस्ति], सर्वम् मृत्युना अभिपन्नम् [अस्ति], [तस्मिन्] केन यजमानः मृत्योः आप्तिम् अतिमुच्यते इति । [याज्ञवल्क्यः आह—यजमानः] होत्रा ऋत्विजा अग्निना वाचा [अतिमुच्यते] । वै वाक् यज्ञस्य होता [अस्ति] । तत् या इयम् वाक् [अस्ति], सः अयम् अग्निः [अस्ति]; सः होता [अस्ति] । सा मुक्तिः [अस्ति]; सा अतिमुक्तिः [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
अश्वल ने कहा: याज्ञवल्क्य, जब यह सब मृत्यु से व्याप्त और मृत्यु के अधीन है, तो यजमान मृत्यु की पकड़ से किसके द्वारा पूरी तरह छूटता है? उत्तर था: होता ऋत्विज्, अग्नि और वाणी के द्वारा। वाणी ही यज्ञ का होता है। जो यह वाणी है, वही यह अग्नि है; वही होता है। यही मुक्ति है, यही मृत्यु से परे मुक्ति है।
English meaning
Ashvala said, “Yajnavalkya, when all this is pervaded and overtaken by death, through what does the sacrificer escape death’s grasp?” “Through the officiating hotri, through fire, through speech. Speech is the sacrifice’s hotri. This speech is this fire; it is the hotri. This is release, this is release beyond death.”
व्याख्या
उत्तर होता के बाहरी अनुष्ठान को वाणी की आन्तरिक शक्ति और अग्नि के ब्रह्माण्डीय रूप से जोड़ता है। यहाँ अतिमुक्ति इसी अनुष्ठानिक चिन्तन का पद है; इसे सभी उपनिषदों में मुक्ति की एकमात्र परिभाषा न मानें।
Explanation
The answer correlates the ritual priest, the inner power of speech and cosmic fire. Atimukti belongs to this ritual contemplation and should not be treated as the sole Upanishadic definition of liberation.
संदर्भ
अश्वल का पहला प्रश्न यज्ञ और मृत्यु के सम्बन्ध पर है।
Context
Ashvala’s first question concerns sacrifice and death.