Passage 41.6
स य इमांस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयात् । अथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयात् । अथ यावदिदं प्राणि यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयात् । अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति । नैव केन चनाप्यम् । कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः इमान् त्रीन् लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात्, सः अस्याः एतत् प्रथमम् पदम् आप्नुयात् । अथ इयम् त्रयी विद्या यावती [अस्ति], यः तावत् प्रतिगृह्णीयात्, सः अस्याः एतत् द्वितीयम् पदम् आप्नुयात् । अथ यावत् इदम् प्राणि [अस्ति], यः तावत् प्रतिगृह्णीयात्, सः अस्याः एतत् तृतीयम् पदम् आप्नुयात् । अथ यः एषः परोरजाः तपति, [सः] अस्याः एतत् एव तुरीयम् दर्शतम् पदम् [अस्ति] । [तत्] केन चन नैव आप्यम् [अस्ति] । कुतः उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् ।
हिन्दी अर्थ
यदि कोई इन तीनों लोकों को पूर्ण रूप से दान में स्वीकार करे, तो वह गायत्री के इस पहले पद की बराबरी तक पहुँचेगा। फिर यदि कोई इस त्रयी विद्या का जितना विस्तार है, उतना सब स्वीकार करे, तो वह उसके दूसरे पद की बराबरी तक पहुँचेगा। फिर यदि कोई जितने भी प्राणी हैं, उन सबके बराबर स्वीकार करे, तो वह उसके तीसरे पद की बराबरी तक पहुँचेगा। पर उसका जो यह चौथा, दर्शनीय, रजस् के पार का पद है, यह तपता हुआ सूर्य, वह किसी भी ऐसी वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकता। फिर कोई इतनी बड़ी मात्रा का दान स्वीकार कर भी कैसे सकता है?
English meaning
If someone were to receive these three worlds in their entirety as gifts, that would reach the measure of Gayatri’s first foot. If someone were to receive as much as the entire extent of the threefold sacred learning, that would reach her second foot. If someone were to receive as much as the whole realm of living beings, that would reach her third foot. But her fourth, visible foot beyond the expanse, this shining sun, cannot be reached by anything of that kind. How, then, could anyone receive gifts on such a scale?
व्याख्या
तीन लोक, त्रयी विद्या और समस्त प्राणी पहले तीन पदों के पूर्वनिर्दिष्ट क्षेत्रों को फिर दोहराते हैं। ग्रहण करने की काल्पनिक मात्रा गायत्री-ज्ञान की महिमा बताती है; किसी व्यक्ति को प्राणियों या लोकों पर वास्तविक स्वामित्व देने का आशय नहीं लिया गया है।
Explanation
The three worlds, threefold learning and all living beings repeat the domains previously assigned to the first three feet. The hypothetical scale of receiving gifts praises knowledge of Gayatri; it is not read as granting actual ownership of beings or worlds.
संदर्भ
पिछले अनुच्छेद की दान-तुलना अब तीन क्रमिक, असम्भव रूप से विशाल मात्राओं में खुलती है। चौथा पद उन सबकी सीमा से बाहर है।
Context
The previous comparison with gifts unfolds into three impossibly large measures. The fourth foot lies beyond them all.