Passage 41.5
तां हैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुः । वागनुष्टुप् । एतद्वाचमनुब्रूम इति । न तथा कुर्यात् । गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयात् । यदि ह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रतिगृह्णाति न हैव तद्गायत्र्या एकं चन पदं प्रति ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
एके ताम् ह एताम् अनुष्टुभम् सावित्रीम्, वाक् अनुष्टुप् [अस्ति]; एतत् वाचम् अनुब्रूमः इति अन्वाहुः । तथा न कुर्यात्; गायत्रीम् एव सावित्रीम् अनुब्रूयात् । यदि ह वै अपि एवम्वित् बहु इव प्रतिगृह्णाति, तत् गायत्र्याः एकम् चन पदम् प्रति न ह एव [पर्याप्तम् भवति] ।
हिन्दी अर्थ
कुछ लोग उस सावित्री को अनुष्टुभ् छन्द में सिखाते हैं, यह कहते हुए कि “वाणी अनुष्टुभ् है, इसलिए हम वाणी को ही सिखाते हैं।” ऐसा नहीं करना चाहिए; सावित्री को गायत्री छन्द में ही सिखाना चाहिए। यदि इस प्रकार जानने वाला मानो बहुत-से दान भी स्वीकार कर ले, तो वह सब गायत्री के एक पद के बराबर भी नहीं होता।
English meaning
Some teach that Savitri in the Anustubh metre, saying, “Speech is Anustubh, so we teach speech.” The text says not to do this, but to teach Savitri in the Gayatri metre. Even if a person who knows in this way accepts what seems a great quantity of gifts, all of it does not equal even a single foot of Gayatri.
व्याख्या
यह ऐतिहासिक शिक्षण-परम्परा गायत्री छन्द को अनुष्टुभ् पर प्राथमिकता देती है। दान की मात्रा की तुलना ज्ञान के पद से की जा रही है। इसे किसी भी प्रकार की संपत्ति ग्रहण करने की आधुनिक नैतिक या कानूनी छूट नहीं माना गया है।
Explanation
This historical teaching tradition gives the Gayatri metre priority over Anustubh. The quantity of gifts is then measured against a foot of knowledge. It is not a modern ethical or legal exemption permitting unrestricted acceptance of wealth.
संदर्भ
सावित्री की शिक्षा का उल्लेख अब छन्द के चयन पर परम्परा के भीतर मतभेद लाता है। इसके बाद दान ग्रहण करने की चर्चा शुरू होती है।
Context
The mention of teaching Savitri introduces a disagreement within the tradition over the metre to use. The passage then turns to accepting gifts.