Passage 22.7
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेति । अब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यः । हृदयं वै ब्रह्मेति । यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तच्छाकल्योऽब्रवीद्धृदयं वै ब्रह्मेति । अहृदयस्य हि किं स्यादिति । अब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठाम् । न मेऽब्रवीदिति । एकपाद्वा एतत्सम्राडिति । स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । हृदयमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा । स्थितिरित्येनदुपासीत । का स्थितिता याज्ञवल्क्य । हृदयमेव सम्राडिति होवाच । हृदयं वै सम्राट्सर्वेषां भूतानामायतनम् । हृदयं वै सम्राट्सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा । हृदये ह्येव सम्राट्सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति । हृदयं वै सम्राट्परमं ब्रह्म । नैनं हृदयं जहाति । सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति । देवो भूत्वा देवानप्येति । य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[याज्ञवल्क्यः आह—] यत् एव ते कश्चित् अब्रवीत्, तत् शृणवाम इति । [जनकः आह—] विदग्धः शाकल्यः मे अब्रवीत्—वै हृदयम् ब्रह्म [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् [आचार्यः] ब्रूयात्, तथा शाकल्यः तत् अब्रवीत्—वै हृदयम् ब्रह्म [अस्ति] इति । हि अहृदयस्य किम् स्यात् इति । तु ते तस्य आयतनम् प्रतिष्ठाम् [च] अब्रवीत् [किम्] । [जनकः आह—] मे न अब्रवीत् इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] सम्राट्, वा एतत् एकपाद् [ब्रह्म अस्ति] इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, सः वै [त्वम्] नः ब्रूहि । [याज्ञवल्क्यः आह—] हृदयम् एव आयतनम् [अस्ति]; आकाशः प्रतिष्ठा [अस्ति] । स्थितिः इति एनद् उपासीत । [जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, का स्थितिता । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—सम्राट्, हृदयम् एव [स्थितिः अस्ति] इति । सम्राट्, वै हृदयम् सर्वेषाम् भूतानाम् आयतनम् [अस्ति] । सम्राट्, वै हृदयम् सर्वेषाम् भूतानाम् प्रतिष्ठा [अस्ति] । सम्राट्, हि एव हृदये सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति । सम्राट्, वै हृदयम् परमम् ब्रह्म [अस्ति] । यः एवम् विद्वान् एतद् उपास्ते, एनम् हृदयम् न जहाति; सर्वाणि भूतानि एनम् अभिक्षरन्ति; [सः] देवः भूत्वा देवान् अप्येति । जनकः वैदेहः ह उवाच—हस्त्यृषभम् सहस्रम् ददामि इति । सः याज्ञवल्क्यः ह उवाच—मे पिता अमन्यत, अननुशिष्य [धनम्] न हरेत् इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: किसी ने तुमसे जो कहा हो, उसे सुनें। जनक ने कहा: विदग्ध शाकल्य ने कहा था कि हृदय ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य बोले: माता, पिता और आचार्य से सुशिक्षित व्यक्ति जैसा कहे, वैसा ही शाकल्य ने कहा; हृदय के बिना क्या हो सकता है? पर क्या उन्होंने उसका आयतन और प्रतिष्ठा भी बताई? नहीं। सम्राट्, तब यह केवल एक पाद वाला ज्ञान है। जनक ने कहा: आप हमें बताइए। हृदय ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा; उसकी स्थिति के रूप में उपासना करनी चाहिए। वह स्थिति क्या है, याज्ञवल्क्य? हृदय ही, सम्राट्। हृदय सभी प्राणियों का आश्रय है और हृदय ही उनकी प्रतिष्ठा है। सभी प्राणी हृदय में ही प्रतिष्ठित होते हैं। हृदय ही परम ब्रह्म है, सम्राट्। जो ऐसा जानकर उसकी उपासना करता है, उससे हृदय का साथ नहीं छूटता, सभी प्राणी उसकी ओर आते हैं और वह देवता होकर देवताओं को प्राप्त होता है। जनक ने कहा: मैं हाथी जैसे वृषभ सहित एक हजार गायें देता हूँ। याज्ञवल्क्य बोले: मेरे पिता मानते थे कि पूरा शिक्षण दिए बिना दान नहीं लेना चाहिए।
English meaning
Yajnavalkya said, “Let us hear whatever someone has told you.” Janaka replied, “Vidagdha Shakalya told me that the heart is brahman.” “Shakalya spoke as one well taught by mother, father and teacher would speak. What could be accomplished without a heart? But did he explain its abode and foundation?” “He did not.” “Then, Your Majesty, that teaching has only one foot.” “Please tell us.” “The heart is its abode and space its foundation. Contemplate it as stability.” “What is that stability, Yajnavalkya?” “The heart itself, Your Majesty. The heart is the abode of all beings and their foundation. All beings are established in the heart. The heart is the highest brahman, Your Majesty. The heart does not forsake one who knows and contemplates it in this way; all beings approach that person, who becomes a deity and joins the gods.” Janaka said, “I give a thousand cows with a bull as large as an elephant.” Yajnavalkya replied, “My father held that one should not take a gift without completing the instruction.”
व्याख्या
हृदय देह, विचार और अनुभव को जोड़ने वाला केन्द्र है। सभी प्राणियों का उसमें स्थित होना इस उपासना की व्यापकता है, भौतिक रूप से सभी जीवों का एक हृदय में समाना नहीं।
Explanation
The heart serves as a centre joining body, thought and experience. All beings being established there expresses the contemplation’s scope, not the physical containment of every creature in one anatomical heart.
संदर्भ
जनक के पूर्वगुरु का हृदय सम्बन्धी उपदेश पूर्ण किया जा रहा है।
Context
A former teacher’s account of the heart is being completed.