Passage 22.4
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेति । अब्रवीन्मे बर्कुर्वार्ष्णः । चक्षुर्वै ब्रह्मेति । यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद्वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेति । अपश्यतो हि किं स्यादिति । अब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठाम् । न मेऽब्रवीदिति । एकपाद्वा एतत्सम्राडिति । स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा । सत्यमित्येतदुपासीत । का सत्यता याज्ञवल्क्य । चक्षुरेव सम्राडिति होवाच । चक्षुषा वै सम्राट्पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति । स आहाद्राक्षमिति तत्सत्यं भवति । चक्षुर्वै सम्राट्परमं ब्रह्म । नैनं चक्षुर्जहाति । सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति । देवो भूत्वा देवानप्येति । य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[याज्ञवल्क्यः आह—] यत् एव ते कश्चित् अब्रवीत्, तत् शृणवाम इति । [जनकः आह—] बर्कुः वार्ष्णः मे अब्रवीत्—वै चक्षुः ब्रह्म [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् [आचार्यः] ब्रूयात्, तथा वार्ष्णः तत् अब्रवीत्—वै चक्षुः ब्रह्म [अस्ति] इति । हि अपश्यतः किम् स्यात् इति । तु ते तस्य आयतनम् प्रतिष्ठाम् [च] अब्रवीत् [किम्] । [जनकः आह—] मे न अब्रवीत् इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] सम्राट्, वा एतत् एकपाद् [ब्रह्म अस्ति] इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, सः वै [त्वम्] नः ब्रूहि । [याज्ञवल्क्यः आह—] चक्षुः एव आयतनम् [अस्ति]; आकाशः प्रतिष्ठा [अस्ति] । सत्यम् इति एतद् उपासीत । [जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, का सत्यता । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—सम्राट्, चक्षुः एव [सत्यम् अस्ति] इति । सम्राट्, वै चक्षुषा पश्यन्तम् आहुः—अद्राक्षीः इति । सः आह—अद्राक्षम् इति । तत् सत्यम् भवति । सम्राट्, वै चक्षुः परमम् ब्रह्म [अस्ति] । यः एवम् विद्वान् एतद् उपास्ते, एनम् चक्षुः न जहाति; सर्वाणि भूतानि एनम् अभिक्षरन्ति; [सः] देवः भूत्वा देवान् अप्येति । जनकः वैदेहः ह उवाच—हस्त्यृषभम् सहस्रम् ददामि इति । सः याज्ञवल्क्यः ह उवाच—मे पिता अमन्यत, अननुशिष्य [धनम्] न हरेत् इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: किसी ने तुमसे जो कहा हो, उसे सुनें। जनक ने कहा: बर्कु वार्ष्ण ने कहा था कि आँख ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य बोले: माता, पिता और आचार्य से सुशिक्षित व्यक्ति जैसा कहे, वैसा ही वार्ष्ण ने कहा; देखने के बिना क्या हो सकता है? पर क्या उन्होंने उसका आयतन और प्रतिष्ठा भी बताई? नहीं। सम्राट्, तब यह केवल एक पाद वाला ज्ञान है। जनक ने कहा: आप हमें बताइए। आँख ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा; उसकी सत्यता के रूप में उपासना करनी चाहिए। वह सत्यता क्या है, याज्ञवल्क्य? आँख ही, सम्राट्। जिसने आँख से देखा हो, उससे लोग पूछते हैं: क्या तुमने देखा? वह कहता है: मैंने देखा। वह सत्य माना जाता है। आँख ही परम ब्रह्म है, सम्राट्। जो ऐसा जानकर उसकी उपासना करता है, उससे आँख का साथ नहीं छूटता, सभी प्राणी उसकी ओर आते हैं और वह देवता होकर देवताओं को प्राप्त होता है। जनक ने कहा: मैं हाथी जैसे वृषभ सहित एक हजार गायें देता हूँ। याज्ञवल्क्य बोले: मेरे पिता मानते थे कि पूरा शिक्षण दिए बिना दान नहीं लेना चाहिए।
English meaning
Yajnavalkya said, “Let us hear whatever someone has told you.” Janaka replied, “Barku Varshna told me that sight is brahman.” “Varshna spoke as one well taught by mother, father and teacher would speak. What could be accomplished without seeing? But did he explain its abode and foundation?” “He did not.” “Then, Your Majesty, that teaching has only one foot.” “Please tell us.” “Sight is its abode and space its foundation. Contemplate it as truth.” “What is that truth, Yajnavalkya?” “Sight itself, Your Majesty. People ask someone who has seen with the eyes, “Did you see?” He replies, “I saw.” That is taken as true. Sight is the highest brahman, Your Majesty. Sight does not forsake one who knows and contemplates it in this way; all beings approach that person, who becomes a deity and joins the gods.” Janaka said, “I give a thousand cows with a bull as large as an elephant.” Yajnavalkya replied, “My father held that one should not take a gift without completing the instruction.”
व्याख्या
सत्यता का आधार यहाँ प्रत्यक्ष देखने की प्रतिष्ठा है। यह हर दृश्य अनुभव या गवाही के अचूक होने का आधुनिक दावा नहीं, न ही दृष्टिहीन व्यक्ति के ज्ञान का निषेध है।
Explanation
Truth is connected here with the authority of direct seeing. This is not a modern guarantee that every visual experience or eyewitness report is infallible, nor a denial of knowledge to blind people.
संदर्भ
जनक के पूर्वगुरु का आँख सम्बन्धी उपदेश पूर्ण किया जा रहा है।
Context
A former teacher’s account of sight is being completed.