Passage 22.5
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेति । अब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः । श्रोत्रं वै ब्रह्मेति । यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेति । अशृण्वतो हि किं स्यादिति । अब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठाम् । न मेऽब्रवीदिति । एकपाद्वा एतत्सम्राडिति । स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्तमित्येनदुपासीत । कानन्तता याज्ञवल्क्य । दिश एव सम्राडिति होवाच । तस्माद्वै सम्राडपि यां काञ्च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छति । अनन्ता हि दिशः । दिशो वै सम्राट्श्रोत्रम् । श्रोत्रं वै सम्राट्परमं ब्रह्म । नैनं श्रोत्रं जहाति । सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति । देवो भूत्वा देवानप्येति । य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभं सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[याज्ञवल्क्यः आह—] यत् एव ते कश्चित् अब्रवीत्, तत् शृणवाम इति । [जनकः आह—] गर्दभीविपीतः भारद्वाजः मे अब्रवीत्—वै श्रोत्रम् ब्रह्म [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] यथा मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् [आचार्यः] ब्रूयात्, तथा भारद्वाजः तत् अब्रवीत्—वै श्रोत्रम् ब्रह्म [अस्ति] इति । हि अशृण्वतः किम् स्यात् इति । तु ते तस्य आयतनम् प्रतिष्ठाम् [च] अब्रवीत् [किम्] । [जनकः आह—] मे न अब्रवीत् इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] सम्राट्, वा एतत् एकपाद् [ब्रह्म अस्ति] इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, सः वै [त्वम्] नः ब्रूहि । [याज्ञवल्क्यः आह—] श्रोत्रम् एव आयतनम् [अस्ति]; आकाशः प्रतिष्ठा [अस्ति] । अनन्तम् इति एनद् उपासीत । [जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, का अनन्तता । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—सम्राट्, दिशः एव [अनन्ताः सन्ति] इति । सम्राट्, वै तस्मात् अपि याम् काम् च दिशम् [पुरुषः] गच्छति, अस्याः अन्तम् न एव गच्छति । हि दिशः अनन्ताः [सन्ति] । सम्राट्, वै दिशः श्रोत्रम् [सन्ति] । सम्राट्, वै श्रोत्रम् परमम् ब्रह्म [अस्ति] । यः एवम् विद्वान् एतद् उपास्ते, एनम् श्रोत्रम् न जहाति; सर्वाणि भूतानि एनम् अभिक्षरन्ति; [सः] देवः भूत्वा देवान् अप्येति । जनकः वैदेहः ह उवाच—हस्त्यृषभम् सहस्रम् ददामि इति । सः याज्ञवल्क्यः ह उवाच—मे पिता अमन्यत, अननुशिष्य [धनम्] न हरेत् इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: किसी ने तुमसे जो कहा हो, उसे सुनें। जनक ने कहा: गर्दभीविपीत भारद्वाज ने कहा था कि श्रवण ही ब्रह्म है। याज्ञवल्क्य बोले: माता, पिता और आचार्य से सुशिक्षित व्यक्ति जैसा कहे, वैसा ही भारद्वाज ने कहा; सुनने के बिना क्या हो सकता है? पर क्या उन्होंने उसका आयतन और प्रतिष्ठा भी बताई? नहीं। सम्राट्, तब यह केवल एक पाद वाला ज्ञान है। जनक ने कहा: आप हमें बताइए। श्रवण ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा; उसकी अनन्तता के रूप में उपासना करनी चाहिए। वह अनन्तता क्या है, याज्ञवल्क्य? दिशाएँ ही, सम्राट्। मनुष्य किसी भी दिशा में जाए, उसके अन्त तक नहीं पहुँचता, क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं। दिशाएँ ही श्रवण हैं। श्रवण ही परम ब्रह्म है, सम्राट्। जो ऐसा जानकर उसकी उपासना करता है, उससे श्रवण का साथ नहीं छूटता, सभी प्राणी उसकी ओर आते हैं और वह देवता होकर देवताओं को प्राप्त होता है। जनक ने कहा: मैं हाथी जैसे वृषभ सहित एक हजार गायें देता हूँ। याज्ञवल्क्य बोले: मेरे पिता मानते थे कि पूरा शिक्षण दिए बिना दान नहीं लेना चाहिए।
English meaning
Yajnavalkya said, “Let us hear whatever someone has told you.” Janaka replied, “Gardabhivipita Bharadvaja told me that hearing is brahman.” “Bharadvaja spoke as one well taught by mother, father and teacher would speak. What could be accomplished without hearing? But did he explain its abode and foundation?” “He did not.” “Then, Your Majesty, that teaching has only one foot.” “Please tell us.” “Hearing is its abode and space its foundation. Contemplate it as boundlessness.” “What is that boundlessness, Yajnavalkya?” “The directions, Your Majesty. Whichever direction a person travels in, one does not reach its end, for the directions are boundless. The directions are hearing. Hearing is the highest brahman, Your Majesty. Hearing does not forsake one who knows and contemplates it in this way; all beings approach that person, who becomes a deity and joins the gods.” Janaka said, “I give a thousand cows with a bull as large as an elephant.” Yajnavalkya replied, “My father held that one should not take a gift without completing the instruction.”
व्याख्या
ध्वनि का विभिन्न दिशाओं से आना श्रवण को दिशाओं से जोड़ता है। अनन्तता किसी दिशा को स्थिर दीवार मानने से रोकती है; श्रवण की उपासना को श्रवण-क्षमता की सामाजिक श्रेष्ठता न बनाया जाए।
Explanation
Sound arriving from different directions connects hearing with spatial orientation. Boundlessness prevents treating a direction as a fixed boundary; contemplation of hearing should not become a claim of social superiority based on hearing ability.
संदर्भ
जनक के पूर्वगुरु का श्रवण सम्बन्धी उपदेश पूर्ण किया जा रहा है।
Context
A former teacher’s account of hearing is being completed.