Passage 2.7
सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् । यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद । तमनवरुध्यैवामन्यत । तं संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत । पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात्सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते । एष वा अश्वमेधो य एष तपति । तस्य संवत्सर आत्मा । अयमग्निरर्कः । तस्येमे लोका आत्मानः । तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव । अप पुनर्मृत्युं जयति । नैनं मृत्युराप्नोति । मृत्युरस्यात्मा भवति । सर्वमायुरेति । एतासां देवतानामेको भवति ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः अकामयत-मे इदम् मेध्यम् स्यात्; अनेन आत्मन्वी स्याम् इति । ततः अश्वः समभवत् । यत् अश्वत्, तत् मेध्यम् अभूत् इति तत् एव अश्वमेधस्य अश्वमेधत्वम् [अस्ति] । यः एनम् एवम् वेद, एषः ह वै अश्वमेधम् वेद । तम् अनवरुध्य एव अमन्यत । संवत्सरस्य परस्तात् तम् आत्मनः आलभत । पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदेवत्यम् प्रोक्षितम् प्राजापत्यम् आलभन्ते । यः एषः तपति, एषः वै अश्वमेधः [अस्ति] । तस्य संवत्सरः आत्मा [अस्ति] । अयम् अग्निः अर्कः [अस्ति] । तस्य इमे लोकाः आत्मानः [सन्ति] । तौ एतौ अर्काश्वमेधौ [स्तः] । सः पुनः एका एव देवता भवति, मृत्युः एव [भवति] । [एवम् विद्वान्] पुनर्मृत्युम् अप जयति; एनम् मृत्युः न आप्नोति; मृत्युः अस्य आत्मा भवति; सर्वम् आयुः एति; एतासाम् देवतानाम् एकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
उसने चाहा: मेरा यह शरीर यज्ञयोग्य हो और इससे मैं आत्मा से युक्त होऊँ। तब अश्व उत्पन्न हुआ। जो फूला था, वह यज्ञयोग्य हुआ; इसी से अश्वमेध का अश्वमेधत्व बताया गया है। जो अश्व को इस प्रकार जानता है, वही अश्वमेध को जानता है। उसने उस अश्व को बिना रोके ही मन में यज्ञ के लिए माना। एक वर्ष बीतने पर उसने अपने लिए उसकी बलि दी और पशुओं को देवताओं के लिए अलग नियत किया। इसलिए प्रजापति के लिए अभिषिक्त पशु की बलि देते हैं, जो सभी देवताओं का भी होता है। यह जो सूर्य तपता है, यही अश्वमेध है; संवत्सर उसका आत्मरूप है। यह अग्नि अर्क है; ये लोक उसके आत्मरूप हैं। ये दोनों अर्क और अश्वमेध हैं। फिर वह एक ही देवता, मृत्यु, हो जाता है। वह पुनर्मृत्यु को जीतता है; मृत्यु उसे नहीं पकड़ती, मृत्यु उसका आत्मरूप हो जाती है। वह पूरा आयुष्य प्राप्त करता है और इन देवताओं में एक हो जाता है।
English meaning
It desired, “May this body of mine be fit for sacrifice, and may I possess a self through it.” Then the horse came into being. What had swollen became fit for sacrifice; through this the text explains ashvamedha. One who knows the horse in this way knows the ashvamedha. It considered that horse for the sacrifice without restraining it. At the end of a year it sacrificed the horse to itself, assigning the other animals to the gods. Accordingly, a consecrated animal dedicated to Prajapati and belonging to all the gods is sacrificed. The sun that gives heat is this ashvamedha, and the year is its self. This fire is arka, and these worlds are its selves. These two are arka and ashvamedha. It then becomes a single deity again, death itself. The knower overcomes repeated death: death does not seize that person but becomes their own self. That person attains a full lifespan and becomes one of these deities.
व्याख्या
अश्वत्, अर्थात् फूला, और अश्व के बीच शब्दसम्बन्ध वैदिक व्याख्या का अंग है। आलभत को बलि देना कहा गया है, ताकि ऐतिहासिक पशुयज्ञ का अर्थ छिपे नहीं। अंतिम वाक्य उस अनुष्ठानिक ज्ञान के फल बताते हैं जिसमें सर्जक, सूर्य, अग्नि और मृत्यु को एक सम्बन्ध में देखा गया है। इन्हें आज पशुयज्ञ करने की सलाह, शारीरिक अमरता की गारंटी या आयु बढ़ाने का चिकित्सकीय उपाय नहीं माना जाना चाहिए।
Explanation
The connection between ashvat, “swelled,” and ashva belongs to the text’s Vedic word explanation. Alabhata is translated as sacrificing rather than euphemized, so that the historical animal sacrifice remains clear. The final sentences state the fruits of ritual knowledge linking creator, sun, fire and death. They are not present-day advice to perform animal sacrifice, guarantees of bodily immortality, or medical means of extending life.
संदर्भ
दूसरा ब्राह्मण अश्व की उत्पत्ति, अश्वमेध के अनुष्ठान और सूर्य-अग्नि की पहचान को एक साथ लाकर समाप्त होता है। इससे आरम्भ के विश्वरूप अश्व का कथात्मक आधार पूरा होता है।
Context
The second brahmana closes by bringing together the horse’s origin, the ashvamedha ritual, and identifications with sun and fire. It completes the narrative background of the cosmic horse at the opening.