Passage 2.5
स ऐक्षत यदि वा इममभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति । स तया वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि यज्ञान् प्रजां पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् । सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ऐक्षत-यदि वै इमम् अभिमंस्ये, कनीयः अन्नम् करिष्ये इति । सः तया वाचा तेन आत्मना इदम् सर्वम् असृजत, यत् इदम् किञ्च [अस्ति]-ऋचः यजूंषि सामानि छन्दांसि यज्ञान् प्रजाम् पशून् । सः यत् यत् एव असृजत, तत् तत् अत्तुम् अध्रियत । सर्वम् वै अत्ति इति तत् अदितेः अदितित्वम् [अस्ति] । यः एवम् एतत् अदितेः अदितित्वम् वेद, [सः] सर्वस्य अत्ता भवति; सर्वम् अस्य अन्नम् भवति ।
हिन्दी अर्थ
उसने सोचा: यदि मैं इसे खा लूँगा तो अपना अन्न कम कर लूँगा। उसने उसी वाणी और उसी आत्मरूप से यह सब उत्पन्न किया: जो कुछ भी है, ऋचाएँ, यजुष्, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु। वह जो-जो उत्पन्न करता गया, उसे खाने का संकल्प करता गया। वह सब कुछ खाता है; इसी से अदिति का अदितित्व बताया जाता है। जो अदिति के इस अदितित्व को इस प्रकार जानता है, वह सबका भोक्ता होता है और सब कुछ उसका अन्न हो जाता है।
English meaning
It considered, “If I eat this, I shall make my food less.” With that speech and that self it created everything here: the Rig verses, Yajus formulas, Saman chants, metres, sacrifices, offspring and animals. Whatever it created, it resolved to eat. Because it eats everything, the text explains it as Aditi. Whoever knows Aditi’s character in this way becomes an eater of everything, and everything becomes that person’s food.
व्याख्या
सृष्टि और भक्षण यहाँ एक ही प्रक्रिया के दो पक्ष हैं। ऋच्, यजुष् और साम के साथ छन्द और यज्ञ भी सृजित जगत् में आते हैं, इसलिए कथा स्वयं वैदिक अनुष्ठान की उत्पत्ति समझाती है। अत्ति और अदिति का सम्बन्ध पाठ की शब्दव्याख्या है। “सब कुछ अन्न” ज्ञान के फल का अनुष्ठानिक कथन है; यह किसी भी वस्तु को खाने या दूसरों पर अधिकार करने की छूट नहीं है।
Explanation
Creation and consumption are two sides of the same process. Metres and sacrifices appear alongside Rig, Yajus and Saman, so the account also explains the emergence of Vedic ritual. The association of atti, “eats,” with Aditi is the text’s interpretive wordplay. The promise that everything becomes food is a ritual statement about knowledge, not permission to eat anything or dominate others.
संदर्भ
पिछले अनुच्छेद की निगलने की इच्छा को यहाँ स्थगित किया जाता है। सर्जक तत्काल भक्षण के बजाय अन्नरूप संसार की बहुलता उत्पन्न करता है।
Context
The wish to swallow the newborn is deferred. Instead of immediate consumption, the creator produces the multiplicity of a world that can serve as food.