Passage 2.3
स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधाविहितः । तस्य प्राची दिक्शिरोऽसौ चासौ चेर्मौ । अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ । दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः । स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितः । यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः आत्मानम् त्रेधा व्यकुरुत-आदित्यम् तृतीयम्, वायुम् तृतीयम् [अकुरुत] । सः एषः प्राणः त्रेधा विहितः [अस्ति] । तस्य प्राची दिक् शिरः [अस्ति]; असौ च असौ च ईर्मौ [स्तः] । अथ अस्य प्रतीची दिक् पुच्छम् [अस्ति]; असौ च असौ च सक्थ्यौ [स्तः] । दक्षिणा च उदीची च पार्श्वे [स्तः] । द्यौः पृष्ठम् [अस्ति]; अन्तरिक्षम् उदरम् [अस्ति]; इयम् उरः [अस्ति] । सः एषः अप्सु प्रतिष्ठितः [अस्ति] । यत्र क्व च एवम् विद्वान् एति, तत् एव प्रतितिष्ठति ।
हिन्दी अर्थ
उसने अपने को तीन भागों में विभक्त किया: सूर्य को एक तिहाई और वायु को एक तिहाई बनाया। यही प्राण तीन रूपों में विभक्त है। पूर्व दिशा उसका सिर है, और उसके दोनों ओर की दिशाएँ दोनों भुजाएँ हैं। पश्चिम दिशा उसकी पूँछ है, और उसके दोनों ओर की दिशाएँ दोनों जाँघें हैं। दक्षिण और उत्तर उसके दोनों पार्श्व हैं। द्युलोक पीठ, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथिवी वक्ष है। वह जल में प्रतिष्ठित है। इसे इस प्रकार जानने वाला जहाँ कहीं जाता है, वहीं प्रतिष्ठा पाता है।
English meaning
It divided itself into three: the sun as one third and wind as one third. This vital power is thus arranged in three forms. East is its head, and the two directions on either side its two arms. West is its tail, and the two directions on either side its thighs. South and north are its flanks. Heaven is its back, the intermediate region its belly, and this earth its chest. It is established in the waters. Whoever knows it in this way finds a footing wherever they go.
व्याख्या
तीसरा भाग पूर्ववर्ती अग्नि है; पाठ सूर्य और वायु को अलग से गिनता है। “असौ च असौ” का संकेत सम्बद्ध दिशा के दोनों ओर की दिशाओं की ओर है। अन्त में ज्ञान के फल के रूप में प्रतिष्ठा कही गई है। यह अनुष्ठानिक ज्ञान की प्रशंसा है, यात्रा की सुरक्षा या सांसारिक सफलता की व्यावहारिक गारंटी नहीं।
Explanation
The remaining third is the fire already introduced; sun and wind are explicitly named here. “That direction and that direction” points to the adjoining directions on either side. The concluding promise of a footing praises this ritual knowledge; it is not practical assurance of safe travel or worldly success.
संदर्भ
अग्नि के प्रकट होने के बाद उसके सूर्य और वायु से सम्बन्ध का वर्णन आता है। दिशाओं को शरीर के रूप में देखने का तरीका पहले ब्राह्मण की संरचना को आगे बढ़ाता है।
Context
After fire emerges, the text relates it to sun and wind. Its directional body continues the mode of correspondence established in the first brahmana.