Passage 2.6
सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यम् । तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत । तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः अकामयत-भूयसा यज्ञेन भूयः यजेय इति । सः अश्राम्यत्; सः तपः अतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशः वीर्यम् उदक्रामत् । प्राणाः वै यशः वीर्यम् [सन्ति] । तत् प्राणेषु उत्क्रान्तेषु शरीरम् श्वयितुम् अध्रियत । तस्य मनः शरीरे एव आसीत् ।
हिन्दी अर्थ
उसने चाहा: मैं और बड़े यज्ञ से फिर यजन करूँ। उसने परिश्रम किया और तप किया। उसके श्रान्त और तप्त होने पर यश और वीर्य बाहर निकल गए। प्राण ही यश और वीर्य हैं। प्राणों के निकल जाने पर शरीर फूलने लगा। उसका मन शरीर में ही बना रहा।
English meaning
It desired, “May I sacrifice further with a greater sacrifice.” It exerted itself and practised austerity. As it grew exhausted and heated, its glory and vigour departed. The vital powers are its glory and vigour. When those powers had gone out, the body began to swell. Its mind remained within the body.
व्याख्या
तपस् में यहाँ गर्मी, श्रम और अनुष्ठानिक प्रयास एक-दूसरे से जुड़े हैं। प्राणों के निकलने और मन के शरीर में रहने का कथन इस खास सृष्टिकथा का हिस्सा है; इसे मृत्यु का आधुनिक चिकित्सकीय मानदण्ड नहीं माना गया है। वीर्य को यहाँ सामर्थ्य या शक्ति कहा गया है, क्योंकि पाठ स्वयं उसे प्राणों के साथ पहचानता है।
Explanation
Heat, exertion and ritual effort are linked in tapas here. The departure of the vital powers while mind remains in the body belongs to this particular creation account; it is not a modern medical criterion of death. Virya is rendered as vigour because the passage itself identifies it with the vital powers.
संदर्भ
अन्नरूप सृष्टि से कथा फिर यज्ञ की ओर मुड़ती है। शरीर का फूलना अगले अनुच्छेद में अश्व शब्द की वैदिक व्याख्या का आधार बनेगा।
Context
The account turns from creation as food back to sacrifice. The swelling body prepares the Vedic explanation of the word ashva in the next passage.