Passage 40.3
साम । प्राणो वै साम । प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि । सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते । साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
साम [इति उपासीत] । प्राणः वै साम [अस्ति]; प्राणे हि इमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि [सन्ति] । अस्मै ह सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते । यः एवम् वेद, [सः] साम्नः सायुज्यम् सलोकताम् जयति ।
हिन्दी अर्थ
साम, अर्थात् गाया जाने वाला स्तोत्र: प्राण ही साम है, क्योंकि ये सभी प्राणी प्राण में एक दिशा में संगत होते हैं। इस प्रकार जानने वाले की श्रेष्ठता के लिए सभी प्राणी एकमत होकर अनुकूल बनते हैं। जो इस प्रकार जानता है, वह साम के साथ सायुज्य और उसी लोक में निवास प्राप्त करता है।
English meaning
Saman, the sung chant: breath is saman, for all these beings come together in concord within breath. All beings become concordant and supportive of such a knower’s pre-eminence. One who knows in this way gains union with saman and residence in its world.
व्याख्या
सम्यञ्चि समान दिशा में आने या संगत होने का भाव देता है। यह सामगान और प्राणियों के सामंजस्य के बीच उपासनात्मक सम्बन्ध है। फलभाषा को यथावत् रखते हुए उसे सुनिश्चित सांसारिक प्रभाव का वादा नहीं बनाया गया है।
Explanation
Samyanci expresses coming into alignment or concord. The passage establishes a contemplative connection between chant and the concord of beings. Its promised benefits are preserved as the text’s claims, not guaranteed worldly effects.
संदर्भ
तीसरा नाम साम है। यजुस् के जोड़ने की बात अब साम के सामंजस्य के रूप में विकसित होती है।
Context
The third name is saman. The joining associated with yajus now develops into concord through saman.