Passage 29.2
अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति । तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति । व्यज्ञासिष्टा३ इति । व्यज्ञासिष्मेति होचुः । दत्तेति न आत्थेति । ओमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह मनुष्याः एनम्, भवान् नः ब्रवीतु इति ऊचुः । [सः] तेभ्यः ह एतत् एव अक्षरम् द इति उवाच; व्यज्ञासिष्टा३ इति [पप्रच्छ] । [मनुष्याः], व्यज्ञासिष्म इति ह ऊचुः; दत्त इति नः आत्थ इति [ऊचुः] । [सः], ओम् इति ह उवाच; व्यज्ञासिष्ट इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
तब मनुष्यों ने उनसे कहा, “आप हमें उपदेश दें।” उन्होंने उनसे वही अक्षर कहा, “द।” फिर पूछा, “समझे?” उन्होंने उत्तर दिया, “समझ गए। आपने हमसे कहा है, ‘दान दो।’” उन्होंने कहा, “हाँ, तुम समझ गए।”
English meaning
Then the human beings said to him, “Please instruct us.” He spoke the same syllable, “da,” to them and asked, “Did you understand?” They replied, “We understood. You told us, ‘Give.’” He said, “Yes, you understood.”
व्याख्या
दत्त का अर्थ “दो” है; यहाँ दान या बाँटने का आग्रह सामने आता है। वही संवाद-रचना दोहराई गई है ताकि मानवीय उदारता को देवताओं के संयम के समानान्तर रखा जा सके, न कि उसके स्थान पर।
Explanation
Datta means “give,” bringing generosity and sharing into view. The repeated exchange places human generosity alongside divine restraint rather than substituting one teaching for the other.
संदर्भ
देवताओं के बाद मनुष्यों की बारी आती है। शिक्षक अपने संकेत को नहीं बदलते, लेकिन शिष्य उसका दूसरा अर्थ ग्रहण करते हैं।
Context
Human beings now follow the gods. The teacher does not change the cue, but the new students receive a different imperative.