Passage 16.2
स होवाचोषस्तश्चाक्रायणः यथा वै ब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति । एष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरः । न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः । न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयाः । न मतेर्मन्तारं मन्वीथा । न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः । एष त आत्मा सर्वान्तरः । अतोऽन्यदार्तम् । ततो होषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
चाक्रायणः उषस्तः सः ह उवाच—यथा वै असौ गौः [अस्ति], असौ अश्वः [अस्ति] इति ब्रूयात्, एवम् एव एतत् व्यपदिष्टम् भवति । यत् एव साक्षात् अपरोक्षात् ब्रह्म [अस्ति], यः सर्वान्तरः आत्मा [अस्ति], तम् मे व्याचक्ष्व इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] एषः ते सर्वान्तरः आत्मा [अस्ति] । [उषस्तः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, कतमः सर्वान्तरः [अस्ति] । [याज्ञवल्क्यः आह—] दृष्टेः द्रष्टारम् न पश्येः; श्रुतेः श्रोतारम् न शृणुयाः; मतेः मन्तारम् न मन्वीथाः; विज्ञातेः विज्ञातारम् न विजानीयाः । एषः ते सर्वान्तरः आत्मा [अस्ति] । अतः अन्यत् आर्तम् [अस्ति] । ततः ह चाक्रायणः उषस्तः उपरराम ।
हिन्दी अर्थ
उषस्त चाक्रायण ने कहा: यह तो ऐसा बताना हुआ जैसे कोई कहे, वह गाय है, वह घोड़ा है। जो वास्तव में साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सबके भीतर का आत्मा है, उसे समझाओ। याज्ञवल्क्य ने कहा: यही तुम्हारा अन्तरतम आत्मा है। कौन-सा अन्तरतम आत्मा? तुम देखने के द्रष्टा को देख नहीं सकते, सुनने के श्रोता को सुन नहीं सकते, सोचने के मन्ता को सोच का विषय नहीं बना सकते और जानने के ज्ञाता को जानने का विषय नहीं बना सकते। यही तुम्हारा सबके भीतर का आत्मा है। इससे भिन्न सब आर्त और क्षयशील है। तब उषस्त चाक्रायण चुप हो गए।
English meaning
Ushasta Chakrayana said, “That only identifies it as one might say, ‘That is a cow; that is a horse.’ Explain the immediately present, non-remote brahman, the Self within everything.” “This is your innermost Self.” “Which is innermost, Yajnavalkya?” “You cannot see the seer of seeing, hear the hearer of hearing, think the thinker of thinking, or know the knower of knowing as an object. This is your Self within everything. Whatever is other than this is afflicted and perishable.” Ushasta Chakrayana then fell silent.
व्याख्या
उत्तर विषय और ज्ञाता का भेद करता है: देखने की कोई वस्तु द्रष्टा के स्थान को नहीं भरती। न देख सकना यहाँ शून्यता का दावा नहीं, आत्मा को बाहरी वस्तु की तरह पकड़ने की सीमा है।
Explanation
The reply distinguishes objects from the knower. No seen object occupies the seer’s role. The inability to objectify the Self is not a claim that nothing exists.
संदर्भ
उषस्त कार्य के संकेत से संतुष्ट नहीं होते और आत्मा को सीधे जानना चाहते हैं।
Context
Ushasta is dissatisfied with a functional indication and asks for direct disclosure.