Passage 33.1
मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यः । तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा । स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अयम् पुरुषः मनोमयः भाःसत्यः [अस्ति] । तस्मिन् अन्तर्हृदये [सः] यथा व्रीहिः वा यवः वा [तत्परिमाणः अस्ति] । सः एषः सर्वस्य ईशानः [अस्ति], सर्वस्य अधिपतिः [अस्ति]; यत् इदम् किञ्च, सर्वम् इदम् प्रशास्ति ।
हिन्दी अर्थ
यह पुरुष मनोमय है और प्रकाश इसका सत्यस्वरूप है। उस हृदय के भीतर वह धान या जौ के दाने जैसा है। यही सबका ईशान, सबका अधिपति है; यहाँ जो कुछ भी है, इस सबका शासन वही करता है।
English meaning
This person is made of mind, with light as its true nature. Within that heart it is like a grain of rice or barley. It is the lord of all, the ruler of all; it governs everything that is here.
व्याख्या
धान और जौ की सूक्ष्मता तथा सर्वाधिपत्य का विस्तार साथ रखे गए हैं। छोटे आकार की उपमा को हृदय में मिलने वाली भौतिक वस्तु का दावा नहीं समझना चाहिए। भाःसत्यः प्रकाश को इस पुरुष की वास्तविकता या स्वरूप बताता है।
Explanation
The smallness of rice or barley is set beside universal lordship. The image of size is not a claim about a physical object discoverable in the heart. Bhahsatya associates the person’s reality or nature with light.
संदर्भ
सूर्य और आँख के पुरुषों से ध्यान अब हृदय में स्थित मनोमय पुरुष पर आता है। यह स्वतन्त्र, छोटा उपासना-वचन है।
Context
The focus moves from the persons in the sun and eye to the mind-formed person in the heart. This is a short, self-contained contemplation.