Passage 1.1
उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः । सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि । ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमानि । उद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धः । यद्विजृम्भते तद्विद्योतते । यद्विधूनुते तत्स्तनयति । यन्मेहति तद्वर्षति । वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
मेध्यस्य अश्वस्य उषा वा शिरः [अस्ति]; सूर्यः चक्षुः [अस्ति]; वातः प्राणः [अस्ति]; व्यात्तम् वैश्वानरः अग्निः [अस्ति]; मेध्यस्य अश्वस्य संवत्सरः आत्मा [अस्ति] । द्यौः पृष्ठम् [अस्ति]; अन्तरिक्षम् उदरम् [अस्ति]; पृथिवी पाजस्यम् [अस्ति]; दिशः पार्श्वे [सन्ति]; अवान्तरदिशः पर्शवः [सन्ति]; ऋतवः अङ्गानि [सन्ति]; मासाः च अर्धमासाः च पर्वाणि [सन्ति]; अहोरात्राणि प्रतिष्ठा [सन्ति]; नक्षत्राणि अस्थीनि [सन्ति]; नभः मांसानि [अस्ति] । सिकताः ऊवध्यम् [सन्ति]; सिन्धवः गुदाः [सन्ति]; यकृत् च क्लोमानः च पर्वताः [सन्ति]; ओषधयः च वनस्पतयः च लोमानि [सन्ति] । उद्यन् पूर्वार्धः [अस्ति]; निम्लोचन् जघनार्धः [अस्ति] । यत् विजृम्भते, तत् विद्योतते; यत् विधूनुते, तत् स्तनयति; यत् मेहति, तत् वर्षति । अस्य वाक् एव वाक् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
प्रातःकाल की उषा यज्ञयोग्य अश्व का सिर है; सूर्य उसकी आँख, वायु उसका प्राण, खुला हुआ मुख वैश्वानर अग्नि और संवत्सर उस अश्व का आत्मरूप शरीर है। आकाश उसकी पीठ, अन्तरिक्ष उदर, पृथिवी उसके पैरों का आधार, दिशाएँ दोनों पार्श्व और बीच की दिशाएँ पसलियाँ हैं। ऋतुएँ अंग, महीने तथा पक्ष जोड़, दिन-रात उसके टिकने के स्थान, नक्षत्र हड्डियाँ और नभ उसका मांस हैं। पेट में पड़ा अन्न रेत है, नदियाँ आँतें हैं, यकृत और क्लोम पर्वत हैं, औषधियाँ तथा वनस्पतियाँ रोम हैं। उगता सूर्य उसका आगे का आधा भाग और अस्त होता सूर्य पीछे का आधा भाग है। उसका जम्हाई लेना बिजली चमकना है; देह झटकना मेघों का गरजना है; मूत्र करना वर्षा है। उसकी वाणी ही वाणी है।
English meaning
Dawn is the head of the horse fit for sacrifice; the sun is its eye, wind its breath, its open mouth the fire called Vaishvanara, and the year the body or self of that sacrificial horse. Heaven is its back, the intermediate region its belly, earth the support beneath its feet, the directions its flanks, and the intermediate directions its ribs. The seasons are its limbs; the months and half-months its joints; days and nights its supports; the stars its bones; and the sky its flesh. The contents of its stomach are sand, rivers its intestines, its liver and lungs the mountains, and herbs and trees its hair. The rising sun is its front half and the setting sun its rear half. Its yawning is lightning, its shaking is thunder, and its urinating is rain. Its voice is voice itself.
व्याख्या
यह सूची अश्व के शरीर में काल, दिशाओं, धरती, आकाश और वर्षा को रखती है। इसका आशय यज्ञ की वस्तु को विश्व के रूप में देखना है, न कि घोड़े की देह का वैज्ञानिक वर्णन करना। आत्मा यहाँ शरीर या सम्पूर्ण रूप के अर्थ में भी काम करता है। मेध्य का यज्ञयोग्य अर्थ और शरीर के ठोस विवरण बनाए रखे गए हैं; ऐतिहासिक पशुयज्ञ को सामान्य जीवन की अनुशंसा नहीं बनाया गया है।
Explanation
The correspondences place time, direction, earth, sky and weather within the horse’s body. They invite a cosmic understanding of the ritual object, rather than a scientific account of equine anatomy. Atman here can mean the body or integral form. The translation retains both the sacrificial sense of medhya and the concrete bodily imagery; it does not recommend historical animal sacrifice.
संदर्भ
ग्रन्थ का आरम्भ अश्वमेध के अश्व और सम्पूर्ण दृश्य विश्व के बीच सम्बन्ध स्थापित करने से होता है। यहाँ याज्ञवल्क्य का संवाद अभी प्रारम्भ नहीं हुआ है।
Context
The book opens by connecting the horse of the ashvamedha with the visible cosmos. The dialogues involving Yajnavalkya have not yet begun.