Shloka 12.6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥१२-६॥
पदच्छेद
येyeतुtuसर्वाणिsarvāṇiकर्माणिkarmāṇiमयिmayiसंन्यस्यsaṃnyasyaमत्पराःmatparāḥअनन्येनananyenaएवevaयोगेनyogenaमाम्māmध्यायन्तःdhyāyantaḥउपासतेupāsate
अन्वय
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः [सन्तः] अनन्येन एव योगेन माम् ध्यायन्तः उपासते, [तेषाम् अहम् मृत्युसंसारसागरात् समुद्धर्ता भवामि नचिरात्] ।
हिन्दी अर्थ
परन्तु जो सभी कर्म मुझे समर्पित करते हैं, मुझे परम मानते हैं और अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए उपासना करते हैं—
English meaning
But those who entrust all their actions to me, take me as the highest and worship me through single-minded yoga, meditating on me—
प्रसंग
कठिन अव्यक्त मार्ग के बाद कृष्ण समर्पित कर्म और एकनिष्ठ ध्यान वाले भक्तों की ओर लौटते हैं।
सरल व्याख्या
कर्म का समर्पण और ध्यान यहाँ एक-दूसरे से अलग नहीं किए गए हैं।
Context
After discussing the difficult unmanifest path, Krishna returns to devotees who offer their actions and contemplate wholeheartedly.
Simple explanation
Offering one's actions and meditation are not separated from one another here.