Passage 2.8
न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अवरेण नरेण प्रोक्तः, बहुधा चिन्त्यमानः एषः न सुविज्ञेयः [अस्ति] । अनन्यप्रोक्ते [अनन्येन आचार्येण प्रोक्ते आत्मनि] अत्र गतिः [अनेकधाचिन्ता] न अस्ति । [एषः आत्मा] हि अणुप्रमाणात् अणीयान् [अस्ति]; अतर्क्यम् [अतर्क्यः इत्यर्थः] [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
साधारण, अपरिपक्व समझ वाले व्यक्ति के समझाने से यह आत्मा ठीक तरह नहीं जानी जाती, क्योंकि उसके विषय में अनेक विचार उठते रहते हैं। अभेददर्शी शिक्षक के बताने पर यह भटकाव नहीं रहता; यह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और केवल तर्क के माप से परे है।
English meaning
When explained by a person of limited understanding, this self is not readily known, being conceived in many conflicting ways. When taught by one who sees no separation, such wandering ceases; it is subtler than the subtle and beyond the measure of mere reasoning.
व्याख्या
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति की कई व्याख्याएँ हैं: संशय का अन्त, संसारगति का अन्त, अथवा अन्य जानने योग्य वस्तु का अभाव। अनुवाद पहले अर्थ को मुख्य रखता है, बिना इसे एकमात्र सम्भव व्याकरण बताने के।
Explanation
The compressed phrase admits several readings: ending uncertainty, ending transmigration, or leaving no separate object to know. This rendering foregrounds the end of confused thought without presenting it as the only possible parsing.
संदर्भ
शिक्षक की योग्यता आत्मा को वस्तु बनाकर कल्पित करने की सीमा से जुड़ती है।
Context
The teacher’s competence is related to the limits of objectifying the self.