Passage 2.13
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
मर्त्यः एतत् [आत्मतत्त्वम्] श्रुत्वा सम्परिगृह्य धर्म्यम् एतम् अणुम् [आत्मानम् शरीरादेः] प्रवृह्य आप्य, सः मोदते; हि मोदनीयम् [आत्मानम्] लब्ध्वा [मोदते] । [अहम्] नचिकेतसम् [प्रति] सद्म विवृतम् मन्ये ।
हिन्दी अर्थ
इसे सुनकर, अच्छी तरह आत्मसात् करके, इस सूक्ष्म धर्मयुक्त आत्मा को देहादि से अलग पहचानकर प्राप्त करने वाला मरणशील आनन्दित होता है, क्योंकि उसने आनन्दयोग्य तत्त्व पा लिया। नचिकेता, मैं समझता हूँ कि तुम्हारे लिए यह भवन खुल गया है।
English meaning
Hearing and fully assimilating this, a mortal distinguishes the subtle self, inseparable from what is right, and attains it. Finding what truly brings joy, that person rejoices. Nachiketas, I consider the dwelling now open to you.
व्याख्या
श्रवण, ग्रहण और विवेकपूर्वक अलग पहचानना तीन जुड़े चरण हैं। खुला भवन ज्ञान के लिए उपलब्ध मार्ग का रूपक है; धर्म्यम् आत्मतत्त्व की सत्यनिष्ठ प्रकृति बताता है, केवल बाह्य कर्मकाण्ड नहीं।
Explanation
Hearing, assimilation and discriminating recognition form a connected sequence. The open dwelling images access to realization; dharmya characterizes the self as consonant with what is right rather than merely with ritual performance.
संदर्भ
ज्ञान के ग्रहण का क्रम शिष्य की पात्रता की स्वीकृति पर समाप्त होता है।
Context
The stages of assimilation culminate in recognition of the pupil’s readiness.