Passage 2.25
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यस्य ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे ओदनः भवतः, यस्य मृत्युः उपसेचनम् [अस्ति], सः यत्र [अस्ति], [तत्] इत्था कः वेद?
हिन्दी अर्थ
जिसके लिए ब्राह्मणीय और क्षात्र शक्ति दोनों भोजन हैं और मृत्यु भी केवल उपसेचन है, वह कहाँ और कैसा है, इसे कौन इस प्रकार जान सकता है?
English meaning
For whom priestly and royal powers alike are food, and death itself only a relish, who can know where and what that one is?
व्याख्या
ब्रह्म और क्षत्र यहाँ समाज की धार्मिक और शासकीय शक्तियाँ हैं, पहले का ब्रह्म शब्द परम ब्रह्म का नाम नहीं। भोजन और उपसेचन का रूपक बताता है कि इन शक्तियों तथा सबको निगलने वाली मृत्यु को भी अन्तिम सीमा नहीं माना गया।
Explanation
Brahma and kshatra here denote priestly and ruling powers; the first word is not the name of ultimate Brahman. Food and relish portray even these powers, and all-consuming death, as subordinate rather than ultimate.
संदर्भ
वल्ली का अन्त मृत्यु से भी बड़े आत्मतत्त्व की प्रबल छवि पर होता है।
Context
The valli ends with a powerful image of a reality greater even than death.