Passage 4.8
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यस्मिन् ऋचः अक्षरे परमे व्योमनि विश्वे देवाः अधि निषेदुः, तम् यः न वेद, [सः] ऋचा किम् करिष्यति? ये इत् तत् विदुः, ते इमे समासते ।
हिन्दी अर्थ
ऋचाएँ उस अक्षर परम आकाश में प्रतिष्ठित हैं जहाँ सभी देव स्थित हैं। जो उसे नहीं जानता, वह केवल ऋचा से क्या करेगा? जो उसे जानते हैं, वे उसी में स्थित होते हैं।
English meaning
The hymns rest in the imperishable highest expanse where all the gods are established. What will one who does not know that accomplish with a hymn? Those who know it find their abiding there.
व्याख्या
ऋचा का मूल्य नकारा नहीं गया; उसके शब्द और उनके अक्षर आधार के बीच सम्बन्ध पूछा गया है। परम व्योम भौतिक अंतरिक्ष का नक्शा नहीं, देव और वाणी की मूल प्रतिष्ठा का रूपक है।
Explanation
The hymn is not simply rejected; the verse asks how its words relate to their imperishable ground. The highest expanse is not a physical star map but an image of the basis of gods and sacred speech.
संदर्भ
ईश्वर का दर्शन करने की बात अब वैदिक मन्त्र के गहरे आधार को जानने की आवश्यकता बनती है।
Context
Seeing the Lord becomes a call to know the deeper ground of the Vedic hymn.