Passage 4.21
अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते । रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २१ ॥
पदच्छेद
अजातःajātaḥइतिitiएवम्evamकश्चित्kaścitभीरुःbhīruḥप्रपद्यतेprapadyateरुद्रrudraयत्yatतेteदक्षिणम्dakṣiṇamमुखम्mukhamतेनtenaमाम्māmपाहिpāhiनित्यम्nityam
अन्वय
कश्चित् भीरुः अजातः इति एवम् प्रपद्यते-रुद्र, ते यत् दक्षिणम् मुखम् [अस्ति], तेन माम् नित्यम् पाहि ।
हिन्दी अर्थ
कोई भयभीत साधक अजन्मा कहकर शरण आता है: हे रुद्र, आपका जो कृपालु मुख है, उससे सदा मेरी रक्षा कीजिए।
English meaning
A frightened seeker takes refuge, addressing the divine as unborn: Rudra, with your gracious face, protect me always.
व्याख्या
दक्षिणम् का अर्थ यहाँ अनुकूल, कृपालु या शुभ है। दार्शनिक निषेधों के बाद प्रार्थना आने से स्पष्ट है कि तत्त्वज्ञान और भावपूर्ण आश्रय इस पाठ में विरोधी नहीं हैं।
Explanation
Dakṣiṇam here suggests gracious or favorable. Prayer following philosophical negation shows that insight and affective trust are not treated as opposites in this text.
संदर्भ
अतिसूक्ष्म तत्त्वचिन्तन के बाद पाठ मनुष्य के भय और शरणागति की सीधी भाषा लौटाता है।
Context
After subtle metaphysical reflection, the text returns to direct human fear and refuge.