Passage 4.10
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
मायाम् तु प्रकृतिम् विद्यात्; मायिनम् च महेश्वरम् [विद्यात्] । तस्य अवयवभूतैः तु इदम् सर्वम् जगत् व्याप्तम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
माया को प्रकृति और मायी को महेश्वर जानना चाहिए। उसके अवयवस्वरूप तत्त्वों से यह पूरा जगत् व्याप्त है।
English meaning
Know māyā as prakṛti, nature, and the possessor of māyā as the great Lord. This entire world is pervaded by what are, as it were, his constituent manifestations.
व्याख्या
प्रकृति और महेश्वर को बिना भेद एक शब्द में मिला देना मन्त्र की संरचना खो देता है। अवयवभूतैः रूपकात्मक सम्बन्ध है; बाद में निष्कल कहे जाने वाले ईश्वर को भौतिक टुकड़ों का ढेर मानना आवश्यक नहीं।
Explanation
Collapsing nature and the great Lord into an undifferentiated label loses the verse’s structure. The language of constituent manifestations need not make the Lord a heap of physical pieces, especially given the later description “without parts.”
संदर्भ
पिछले मन्त्र की माया और मायी का नाम लेकर सम्बन्ध स्पष्ट किया जाता है।
Context
The preceding māyā and its possessor are explicitly identified.