Passage 4.17
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
एषः देवः विश्वकर्मा महात्मा जनानाम् हृदये सदा सन्निविष्टः [अस्ति] । [सः] हृदा मनीषा मनसा अभिक्लृप्तः [अस्ति] । ये एतत् विदुः, ते अमृताः भवन्ति ।
हिन्दी अर्थ
यह महान् आत्मस्वरूप देव विश्वकर्ता है, जो सदा जनों के हृदय में स्थित है। हृदय, विवेक और मन से उसका बोध होता है; इसे जानने वाले अमृत होते हैं।
English meaning
This divine maker of the world, the great Self, is always present in people’s hearts. He is discerned through heart, insight and mind; those who know this become immortal.
व्याख्या
इस पुनरावृत्ति में अंगुष्ठमात्र की जगह विश्वकर्मा है; इससे हृदय की निकटता और ब्रह्माण्ड की रचना का सम्बन्ध उभरता है। अन्तर्यामी को केवल निजी भावना तक सीमित नहीं किया गया।
Explanation
Replacing the thumb-sized image with “world-maker” links inward intimacy with cosmic creativity. The indwelling reality is not reduced to a merely private feeling.
संदर्भ
३.१३ के हृदयस्थ पुरुष का स्वर फिर आता है, इस बार विश्वकर्मा नाम के साथ।
Context
The inward-presence wording of 3.13 returns, now naming the divine as the maker of the world.