Passage 3.6
यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
गिरिशन्त, याम् इषुम् हस्ते अस्तवे बिभर्षि, गिरित्र, ताम् शिवाम् कुरु । पुरुषम् जगत् मा हिंसीः ।
हिन्दी अर्थ
हे गिरिशन्त, जिस बाण को आप हाथ में छोड़ने के लिए धारण करते हैं, हे गिरित्र, उसे शुभ कर दीजिए; मनुष्य और चल जगत् को हानि न पहुँचाइए।
English meaning
Giriśanta, the arrow you hold in your hand to discharge, make it beneficent, O Giritra. Do not harm the person or the moving world.
व्याख्या
बाण का प्रसंग वैदिक रुद्र-स्तुति की रक्षा माँगने वाली भाषा रखता है। पुरुषम् जगत् को संयुक्त या पृथक् कर्म के रूप में पढ़ा जा सकता है; यहाँ मनुष्य और जीवित गति-जगत् दोनों का संरक्षण अभिप्रेत है।
Explanation
The arrow retains the protective prayer-language of Vedic hymns to Rudra. Puruṣam jagat allows connected or separate construals; this rendering makes the protection of persons and the moving world explicit.
संदर्भ
शान्त रूप की याचना अब रुद्र के बाण को अहित से हटाने की प्रार्थना बनती है।
Context
The request for a peaceful form becomes a prayer to turn Rudra’s arrow away from harm.