Passage 3.13
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अङ्गुष्ठमात्रः अन्तरात्मा पुरुषः जनानाम् हृदये सदा सन्निविष्टः [अस्ति] । [सः] हृदा मनीषा मनसा अभिक्लृप्तः [अस्ति] । ये एतत् विदुः, ते अमृताः भवन्ति ।
हिन्दी अर्थ
अंगुष्ठमात्र कहा गया अन्तरात्मा पुरुष सदा मनुष्यों के हृदय में स्थित है। हृदय, विवेक और मन से उसका बोध किया जाता है; उसे जानने वाले अमृत होते हैं।
English meaning
The inward Self, the Puruṣa described as thumb-sized, is always present in the human heart. He is discerned through heart, insight and mind; those who know this become immortal.
व्याख्या
अंगुष्ठमात्र ध्यान के लिए एक सन्निकट रूपक है; सर्वव्यापक आत्मा को शारीरिक लम्बाई में सीमित कर देना आस-पास के मन्त्रों से मेल नहीं खाता। हृदय के साथ मनीषा बुद्धिसंगत विवेक को भी रखती है।
Explanation
Thumb-size provides a concentrated contemplative image; restricting the all-pervading Self to a bodily measurement conflicts with nearby verses. Alongside heart, manīṣā keeps discerning intelligence in view.
संदर्भ
विस्तृत विश्वरूप अब ध्यान में निकट अनुभव होने वाले हृदयस्थ पुरुष के रूप में आता है।
Context
The cosmic form becomes the inward Puruṣa encountered close at hand in the heart.