Passage 3.19
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ १९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः अपाणिपादः जवनः ग्रहीता [अस्ति]; अचक्षुः [सन्] पश्यति; अकर्णः [सन्] शृणोति । सः वेद्यम् वेत्ति; तस्य वेत्ता च न अस्ति । तम् अग्र्यम् महान्तम् पुरुषम् आहुः ।
हिन्दी अर्थ
हाथ-पैर न होते हुए भी वह तीव्रगामी और ग्रहण करने वाला है; आँख न होते हुए देखता और कान न होते हुए सुनता है। वह जानने योग्य को जानता है, किन्तु उसका कोई जानने वाला नहीं। उसे अग्रणी महान् पुरुष कहते हैं।
English meaning
Without hands or feet he moves swiftly and grasps; without eyes he sees, without ears he hears. He knows what is knowable, yet there is no knower who comprehends him as an object. He is called the foremost, great Puruṣa.
व्याख्या
वह अज्ञेय है का अर्थ पूर्णतः असम्बद्ध या अनुपलब्ध होना नहीं, क्योंकि उपनिषद् उसे जानने की बात लगातार करता है। सीमा यह है कि सर्वज्ञाता को किसी दूसरे ज्ञाता की साधारण वस्तु न माना जाए।
Explanation
Incomprehensibility cannot mean total inaccessibility, since the text repeatedly urges knowing him. The limit concerns treating the universal knower as an ordinary object for another observer.
संदर्भ
इन्द्रियों से रहित आधार का विचार क्रिया और ज्ञान के स्पष्ट विरोधाभासों से विकसित होता है।
Context
The sense-free ground is developed through explicit paradoxes of action and knowledge.