Passage 1.12
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते । भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद । स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
महः इति ब्रह्म [अस्ति] । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदाः महीयन्ते । भूः इति वै प्राणः [अस्ति]; भुवः इति अपानः [अस्ति]; सुवर् इति व्यानः [अस्ति]; महः इति अन्नम् [अस्ति] । अन्नेन वाव सर्वे प्राणाः महीयन्ते । ताः वै एताः चतस्रः चतुर्धा [सन्ति]; चतस्रः चतस्रः व्याहृतयः [सन्ति] । यः ताः वेद, सः ब्रह्म वेद । सर्वे देवाः अस्मै बलिम् आवहन्ति ।
हिन्दी अर्थ
महः ब्रह्म है; ब्रह्म से सभी वेद महिमा पाते हैं। भूः प्राण है, भुवः अपान है, सुवः व्यान है; महः अन्न है, क्योंकि अन्न से सभी प्राण पुष्ट और महिमान्वित होते हैं। ये चार व्याहृतियाँ चार प्रकार की हैं, चार-चार करके। जो इन्हें जानता है वह ब्रह्म को जानता है। सभी देवता उसके लिए भेंट लाते हैं।
English meaning
Mahah is Brahman, for through Brahman all the Vedas are magnified. Bhuh is prana, Bhuvah apana, and Suvah vyana; Mahah is food, for food magnifies and sustains all the vital functions. These four utterances are fourfold, four in each grouping. Whoever knows them knows Brahman. All the gods bring an offering to that person.
व्याख्या
अन्न को चौथे स्थान पर रखने से जीवन-क्रियाओं की पोषण पर निर्भरता उभरती है। यहाँ ब्रह्म का अर्थ मन्त्र-सम्बन्ध में पवित्र वाणी या उसका आधार और समापन में परम तत्त्व, दोनों स्तरों पर पढ़ा जाता है। देवताओं की भेंट ध्यान की पारम्परिक फलश्रुति है, किसी बाहरी पुरस्कार का मापने योग्य आश्वासन नहीं।
Explanation
Placing food fourth emphasizes the dependence of vital activity on nourishment. Brahman can carry the sense of sacred formulation or its ground within the Vedic grouping, while the conclusion points toward ultimate reality. The gods’ offering belongs to the traditional praise of this knowledge, not to a measurable promise of reward.
संदर्भ
वेदों का समूह पूरा होने के बाद प्राण और अन्न का समूह आता है। इस प्रकार चार व्याहृतियों के सोलह सम्बन्ध पूरे होते हैं।
Context
After completing the group of Vedic recitations, the passage turns to vital functions and food. The four utterances now have sixteen correspondences in all.