Passage 3.1
भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तँ होवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
वारुणिः भृगुः वै पितरम् वरुणम् उपससार-भगवः, ब्रह्म अधीहि इति । [वरुणः] तस्मै एतत् प्रोवाच-अन्नम् प्राणम् चक्षुः श्रोत्रम् मनः वाचम् इति । तम् ह उवाच-यतः वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, प्रयन्ति यत् अभिसंविशन्ति, तत् विजिज्ञासस्व; तत् ब्रह्म इति । सः तपः अतप्यत; सः तपः तप्त्वा [अन्नम् ब्रह्म इति व्यजानात्] ।
हिन्दी अर्थ
वरुण के पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के पास पहुँचे और बोले, “भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए।” उन्होंने उनसे यह कहा: “अन्न, प्राण, आँख, कान, मन और वाणी।” फिर उनसे कहा: “जिससे ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं, और जिसमें जाते हुए प्रवेश कर जाते हैं, उसे विशेष रूप से जानने की इच्छा करो; वही ब्रह्म है।” भृगु ने तप किया। तप करने के बाद…
English meaning
Bhṛgu, the son of Varuṇa, approached his father Varuṇa and said, “Revered sir, teach me about Brahman.” He told him: “Food, life-breath, sight, hearing, mind, and speech.” He then said to him: “Seek to know that from which these beings arise, by which they live once born, and into which they pass and enter. That is Brahman.” Bhṛgu undertook tapas, disciplined practice. Having practised tapas…
व्याख्या
यहाँ किसी एक वस्तु को तुरन्त अंतिम उत्तर नहीं घोषित किया गया है। “विजिज्ञासस्व” विद्यार्थी को स्वयं गहराई से खोजने के लिए प्रेरित करता है; आगे के अनुवाक इसी खोज की अवस्थाएँ हैं। तप का अर्थ इस प्रसंग में अनुशासित साधना और गहन मनन से जोड़ा जा सकता है, न कि आवश्यक रूप से शरीर को यातना देना।
Explanation
The instruction does not immediately identify a single object as the final answer. “Seek to know” calls for an inquiry that the following passages unfold step by step. In this setting tapas can include disciplined concentration and reflection; the passage does not require self-injury.
संदर्भ
भृगु की जिज्ञासा से इस वल्ली का आरम्भ होता है। पिता पहले अनुभव के परिचित क्षेत्रों की सूची देते हैं, फिर उत्पत्ति, जीवन और अन्ततः प्रवेश के आधार से ब्रह्म की खोज का संकेत देते हैं।
Context
This vallī opens with Bhṛgu seeking instruction. His father first names familiar dimensions of experience, then frames the inquiry through the origin, sustaining ground, and final destination of beings.