Passage 6.9
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अस्य रूपम् संदृशे न तिष्ठति । कश्चन एनम् चक्षुषा न पश्यति । [एषः] हृदा मनीषा मनसा अभिक्लृप्तः [अस्ति] । ये एतत् विदुः, ते अमृताः भवन्ति ।
हिन्दी अर्थ
उसका रूप दृश्य क्षेत्र में नहीं ठहरता; कोई उसे आँख से नहीं देखता। हृदय, विवेक और मन से वह जाना जाता है। जो इसे जानते हैं वे अमृत होते हैं।
English meaning
Its form does not stand within the field of sight; no one sees it with the eye. It is apprehended through the heart, discernment and mind. Those who know this become immortal.
व्याख्या
हृदय यहाँ अन्तरबोध का केन्द्र है, केवल मांसल अंग नहीं। अभिक्लृप्तः को मन की मनमानी कल्पना न समझकर सुस्थापित बोध के अर्थ में पढ़ा गया है, क्योंकि लक्ष्य कोई नया मानसिक चित्र बनाना नहीं।
Explanation
Heart names the centre of inward understanding rather than merely the physical organ. The expression is read as settled apprehension, not arbitrary invention of a mental image.
संदर्भ
लक्षणरहित पुरुष को जानने और देखने का अन्तर समझाया जाता है।
Context
The difference between knowing and seeing the unmarked person is clarified.