Passage 6.4
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
इह चेत् शरीरस्य विस्रसः प्राक् [तत् ब्रह्म] बोद्धुम् अशकत्, [संसारबन्धनात् विमुच्यते] । [न चेत् अशकत् बोद्धुम्], ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ।
हिन्दी अर्थ
यदि मनुष्य यहाँ शरीर के बिखरने से पहले उसे जान सके, तो मुक्ति पाता है; यदि न जान सके, तो सृष्टि के लोकों में फिर शरीर धारण करने योग्य होता है।
English meaning
If one can understand it here before the body falls apart, release is attained; if not, one becomes subject to embodiment in the worlds of creation.
व्याख्या
मन्त्र का वाक्य अत्यन्त संक्षिप्त है और दो परिणामों का विरोध स्पष्ट शब्दों में पूरा नहीं करता। अनुवाद परम्परागत व्याख्या के अनुसार पहले भाग में मुक्ति और दूसरे में “यदि नहीं” जोड़ता है; ये पूरक अर्थ हैं, अतिरिक्त संस्कृत पद नहीं।
Explanation
The verse is compressed and does not fully state the contrast between its two outcomes. The rendering follows traditional exegesis by supplying release after the first condition and “if not” before renewed embodiment; these are explanatory supplements.
संदर्भ
आत्मज्ञान की आवश्यकता इसी जीवन में रखी जाती है।
Context
The need for realization is placed within this life.