Passage 3.15
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यत् अशब्दम् अस्पर्शम् अरूपम् अव्ययम् तथा अरसम् नित्यम् अगन्धवत् च, अनादि अनन्तम् महतः परम् ध्रुवम् [अस्ति], तत् निचाय्य [ज्ञाता] मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ।
हिन्दी अर्थ
जो शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, अविनाशी, रसरहित, नित्य और गन्धरहित है; जिसका न आदि है न अन्त, जो महान् से परे और स्थिर है, उसे जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से मुक्त होता है।
English meaning
Recognizing that which has no sound, touch, form, taste or smell, which is undiminishing and eternal, without beginning or end, beyond the great and steadfast, one is freed from the mouth of Death.
व्याख्या
निषेधों की श्रृंखला किसी अँधेरी या रिक्त वस्तु का चित्र नहीं बनाती, बल्कि इन्द्रियविषयों में उसे सीमित करने से रोकती है। महान् से परे का पद पिछले क्रम से जुड़ता है। मुक्ति का कथन इस दार्शनिक बोध से सम्बन्धित है, शरीर को चोट देकर मृत्यु पार करने से नहीं।
Explanation
The series of negations does not describe a dark or empty object; it prevents confinement to sensory objects. “Beyond the great” recalls the preceding hierarchy. Release is connected with this understanding, not with overcoming death through injury to the body.
संदर्भ
आत्मा की पहचान इन्द्रियगुणों से परे और परिवर्तन से असम्बद्ध तत्त्व के रूप में कही जाती है।
Context
Recognition is directed toward what is beyond sensory qualities and not subject to change.